प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में रामराज की बात करते हैं—एक ऐसा आदर्श शासन जहाँ सत्य, न्याय और ईमानदारी सर्वोपरि हों। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। आज देश में जिस मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं, वह है—कॉरपोरेट राज, जहाँ आम नागरिकों के लिए नियम अलग और बड़ी कंपनियों के लिए पूरी तरह अलग हैं।
कॉरपोरेट कर्ज माफी का खेल और आम आदमी पर दोहरा बोझ
Times of India की रिपोर्ट के अनुसार, दिवालिया हो चुके शिवा शंकरण, जो अब सेशल्स की नागरिकता ले चुके हैं, वहां रतन टाटा का महल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं—क़रीब ₹55 करोड़ में।
सवाल यह है कि—जो व्यक्ति हजारों करोड़ का कर्ज नहीं चुका पाया, वह विदेशी जमीन पर करोड़ों की प्रॉपर्टी कैसे खरीद रहा है?June 2021 की Business Standard रिपोर्ट बताती है कि उनकी कंपनी—Shiva Industries—द्वारा 4863 करोड़ का लोन डिफॉल्ट किया गया था। इसके बावजूद LIC, SBI, यूनियन बैंक, PNB ने मिलकर केवल ₹318 करोड़ में पूरा मामला निपटा दिया।यानि क़रीब 4000 करोड़ रुपये की छूट।
इसके उलट, आम मिडिल क्लास अगर दो महीना भी EMI देर से भर दे, तो बैंक उसका घर नीलाम करने पहुँच जाते हैं।
LIC पर सबसे बड़े सवाल — जनता का पैसा किसके लिए इस्तेमाल हो रहा है?
देश का सबसे बड़ा फंड—57 लाख करोड़ रुपये—LIC के पास है, जो करोड़ों पॉलिसीधारकों की मेहनत से बनता है।
लेकिन आज Times of India, Mint और The Minute की रिपोर्ट्स यह संकेत दे रही हैं कि—क्या LIC के फंड का इस्तेमाल चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को राहत देने के लिए हो रहा है?Mint की गहन रिपोर्ट के मुताबिक, 9000 से अधिक कॉरपोरेट प्रस्तावों पर LIC की वोटिंग का अध्ययन किया गया।
परिणाम चौंकाने वाले हैं—
- 92% मामलों में LIC ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया
- 6% में गैरहाज़िर रही
- 2% प्रस्तावों को ही खारिज किया
- खास बात: Reliance और Adani समूह के किसी भी प्रस्ताव का विरोध नहीं किया गया
जबकि बाकी कंपनियों—जैसे TVS, Bajaj Finance—के समान प्रस्तावों पर LIC ने विरोध भी किया और कई बार वोटिंग में हिस्सा भी नहीं लिया।टाटा ग्रुप को 44,000 करोड़ की सब्सिडी और 758 करोड़ का राजनीतिक चंदा—क्या यह संयोग है?
Scroll की रिपोर्ट (नवंबर 2025) में एक बड़ा खुलासा है—
फरवरी 2024 में मोदी सरकार ने सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट के लिए टाटा समूह की दो कंपनियों को 44,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी।सिर्फ चार हफ्ते बाद टाटा समूह ने BJP को 758 करोड़ रुपये का चंदा दिया।देश के नागरिकों को इस लेन-देन की जानकारी बाद में मिली, वह भी मीडिया की एक रिपोर्ट के ज़रिये।अडानी समूह को LIC का गुप्त समर्थन? Washington Post की पड़ताल
Washington Post की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में जब अडानी समूह पर कर्ज का दबाव बढ़ रहा था और विदेशी बैंक लोन देने से हिचक रहे थे, तभी—
LIC ने अडानी ग्रुप में 3458 करोड़ का निवेश किया।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि अंदरूनी दस्तावेजों से पता चलता है कि सरकार के अधिकारियों ने खुद यह प्रस्ताव तैयार किया था, जिसके आधार पर LIC ने निवेश किया।यह निवेश ठीक उसी महीने हुआ जब अडानी पोर्ट्स को 585 मिलियन डॉलर की तत्काल जरूरत थी।लेकिन LIC और सरकार दोनों ने इन दावों का खंडन किया—
मगर जवाब बिना किसी हस्ताक्षर के जारी हुआ, जिसने संदेह और बढ़ा दिया।क्या भारत की आर्थिक सेहत के आंकड़े भी भरोसेमंद नहीं? IMF ने दिया ‘C ग्रेड’The Hindu की रिपोर्ट सामने आने के बाद एक और बड़ा सवाल उठा है—

IMF ने भारत सरकार के GDP डेटा को लगातार दूसरे साल ‘C ग्रेड’ क्यों दिया?
- GDP आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध बताई गई
- असंगठित क्षेत्र—जो देश की अर्थव्यवस्था का 90% है—उसके वास्तविक योगदान का कोई ठोस डाटा मौजूद नहीं
- केवल संगठित क्षेत्र की कुछ हजार कंपनियों के प्रदर्शन से GDP तय कर दी जाती है
इससे सरकार के दावों और जमीन की हकीकत में गहरा अंतर दिखाई देता है। हिंदी मीडिया की चुप्पी और जनता का अंधेराWashington Post, Mint, The Minute और The Hindu ने लगातार देश की वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
लेकिन हिंदी के मुख्यधारा अखबार इन गंभीर खबरों से दूरी बनाए रखते हैं।





