पटना | KhabarX इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट
बिहार में अप्रैल 2016 में लागू हुई शराबबंदी को सरकार ने “सामाजिक क्रांति” और “महिला सशक्तिकरण” का कदम बताया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे बिहार की नई पहचान कहा था। लेकिन 9 साल बाद हकीकत यह है कि शराबबंदी अब नशा-मुक्त समाज की पहल नहीं, बल्कि गरीबों को जेल में ठूंसने और माफियाओं को करोड़ों का मुनाफा दिलाने वाला धंधा बन चुकी है।
जेलों में 60% से ज्यादा कैदी शराबबंदी एक्ट के तहत
बिहार राज्य कारा विभाग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार:
- राज्य की जेलों में बंद कैदियों में से 60% से अधिक लोग शराबबंदी एक्ट में पकड़े गए हैं।
- इनमें से 70% गरीब तबके से आते हैं – दिहाड़ी मज़दूर, रिक्शा चालक, छोटे दुकानदार और किसान।
- बड़ी संख्या में महिलाएं भी जेलों में हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके घर से शराब की बोतलें बरामद हुईं।
पटना हाईकोर्ट ने भी 2022 में टिप्पणी की थी:
“बिहार की जेलें शराबबंदी एक्ट के आरोपियों से ठसाठस भरी हुई हैं। राज्य को अपनी नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए।”
माफिया और सिस्टम का गठजोड़
शराबबंदी के बावजूद गांव-गांव में शराब मिलना आसान है।
- झारखंड, यूपी और नेपाल से शराब की सप्लाई रोज़ाना हो रही है।
- सूत्रों का कहना है कि हर खेप पर थाने और उत्पाद विभाग का कट तय होता है।
- स्थानीय नेताओं और ठेकेदारों के संरक्षण में माफिया पूरे नेटवर्क को चला रहे हैं।
एक पूर्व उत्पाद विभाग अधिकारी (नाम न छापने की शर्त पर) ने KhabarX को बताया:
“हर थाने का मासिक रेट बंधा हुआ है। अगर सप्लाई पकड़ी जाती है तो भी ऊपर से फोन आता है और मामला दबा दिया जाता है। असली माफिया कभी जेल नहीं जाता, सिर्फ छोटे लोग फंसते हैं।”
जहरीली शराब से मौतें, लेकिन कोई जिम्मेदार नहीं
बिहार में शराबबंदी के दौरान सबसे भयावह तस्वीर जहरीली शराब कांड की रही।
- दिसंबर 2022 में सारण जिले में जहरीली शराब पीने से 80 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
- इसी तरह 2021-23 में गोपालगंज, भागलपुर, बक्सर और मुजफ्फरपुर में सैकड़ों मौतें दर्ज हुईं।
- मरने वाले लगभग सभी गरीब तबके से थे।
सरकार ने हर बार पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने से साफ़ इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधान सभा में कहा था:
“जो शराब पिएगा, वो मरेगा। इसमें सरकार कुछ नहीं करेगी।”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर शराबबंदी पूरी तरह लागू है, तो जहरीली शराब हर बार कहां से आती है?
शराबबंदी या उगाही का कानून?
ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि शराबबंदी अब “उगाही और डर का औजार” बन गई है।
- पुलिस आए दिन छापेमारी करती है, लेकिन अक्सर गरीबों को ही फर्जी केस में फंसाया जाता है।
- “केस दर्ज न करने” या “जमानत में मदद” के लिए खुलेआम वसूली होती है।
- गांवों में लोग कहते हैं कि शराबबंदी का कानून सिर्फ गरीब के लिए सख्त और अमीर के लिए ढीला है।
दरभंगा के एक पीड़ित परिवार ने KhabarX से कहा:
“हमारे घर से 2 बोतल देशी शराब मिली थी, मेरे पति 1 साल से जेल में हैं। लेकिन गांव का असली सप्लायर आज भी पुलिस को पैसा देकर धंधा चला रहा है।”
शराबबंदी से कौन फायदा उठा रहा है?
- प्रशासन और पुलिस: हर खेप से करोड़ों की वसूली।
- राजनीतिक संरक्षण वाले माफिया: शराबबंदी के नाम पर सप्लाई और मुनाफा।
- राज्य सरकार: दिखावे में “नशामुक्ति” की राजनीति, लेकिन अंदरखाने टैक्स से ज़्यादा कमाई।
जनता का सवाल
- अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो माफिया जेल के बाहर क्यों हैं और गरीब ही शिकार क्यों?
- जब हर साल सैकड़ों लोग जहरीली शराब से मर रहे हैं, तो क्या यह कानून सफल माना जा सकता है?
- क्या शराबबंदी बिहार में सामाजिक सुधार है या फिर भ्रष्टाचार और कमाई का नया मॉडल?
बिहार में शराबबंदी का यह काला सच अब किसी से छुपा नहीं है। यह कानून अब सवालों के घेरे में है—क्या यह समाज सुधार की नीति है, या फिर भ्रष्ट सिस्टम का “सोने की खान”?




