बिहार में शराबबंदी लागू हुए कई साल बीत चुके हैं। सरकार का उद्देश्य नशे पर रोक लगाना और सामाजिक सुधार लाना था। लेकिन अब जमीन से उठ रही आवाजें एक नया सवाल खड़ा कर रही हैं — क्या नशा खत्म हुआ, या सिर्फ उसका रूप बदल गया?
राज्य के अलग-अलग जिलों से मिल रही जानकारियों में एक शब्द बार-बार सामने आता है — “सूखा नशा”। स्थानीय भाषा में इसे ऐसे नशे के तौर पर देखा जा रहा है जो आसानी से छुपाया जा सके, जल्दी पकड़ा न जाए और युवाओं के बीच तेजी से फैल रहा हो।
भागलपुर: बदलते माहौल की जमीनी तस्वीर
भागलपुर के बरारी, तिलकामांझी, मनाली, परबत्ती और सराय जैसे इलाके हाल के वर्षों में चर्चा में आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जहां शराब की खुलेआम चर्चा होती थी, अब छोटे समूहों में अलग तरह की गतिविधियां नजर आती हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि देर शाम के बाद कुछ इलाकों में युवाओं का जमावड़ा बढ़ा है। हालांकि कोई खुलकर बोलने से बचता है, लेकिन चिंता साफ दिखाई देती है।एक बुजुर्ग निवासी बताते हैं: पहले लोग शराब से परेशान थे, अब लगता है कि नशा बदल गया है। बच्चों में बदलाव दिख रहा है लेकिन पकड़ना मुश्किल है।
बिहार के दूसरे जिलों में भी संकेत
भागलपुर अकेला जिला नहीं है जहां ऐसी चर्चा हो रही है। पटना, मुजफ्फरपुर, गया, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार और अररिया जैसे जिलों में भी सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच इसी तरह की चिंताएं सामने आती रही हैं।हालांकि आधिकारिक तौर पर हर मामले को “ड्रग नेटवर्क” कहना आसान नहीं, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड और समय-समय पर हुई छापेमारी यह दिखाती है कि अवैध नशे से जुड़ी गतिविधियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं।
पिछले कुछ वर्षों का ट्रेंड (सामान्य पैटर्न)
पुलिस और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर देखा जाए तो:
- नशा संबंधित मामलों में छापेमारी की संख्या कई जिलों में बढ़ी
- युवाओं की संलिप्तता को लेकर चिंता जताई गई
- छोटे पैकेट और कम मात्रा में पकड़े जाने के मामले सामने आए
- स्कूल-कॉलेज के आसपास जागरूकता अभियान भी चलाए गए
विशेषज्ञ मानते हैं कि जब किसी एक तरह के नशे पर सख्ती होती है, तो कई बार बाजार दूसरे विकल्प तलाशने लगता है।
युवाओं पर असर: सबसे बड़ा सवाल
ग्राउंड लेवल पर सबसे ज्यादा चिंता युवाओं को लेकर है। स्थानीय शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि व्यवहार में बदलाव, पढ़ाई से दूरी और मानसिक तनाव जैसी बातें बढ़ती दिख रही हैं।एक शिक्षक ने बताया: हर मामला नशे से जुड़ा हो ऐसा नहीं है, लेकिन युवाओं के बीच गलत चीजों की उपलब्धता बढ़ना चिंता पैदा करता है।विशेषज्ञों का मानना है कि बेरोजगारी, सोशल मीडिया का दबाव और गलत संगत जैसी चीजें भी इस समस्या को बढ़ा सकती हैं।

प्रशासन के सामने चुनौतिया
शराब की तुलना में सूखे नशे की पहचान करना ज्यादा कठिन माना जाता है। इसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं:
आसानी से छुपाया जा सकता है
छोटे स्तर पर सप्लाई
नेटवर्क जल्दी बदल जाते हैं
प्रमाण जुटाना मुश्किल
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं और निगरानी बढ़ाई जा रही है, लेकिन समाज की भागीदारी भी जरूरी है।
सामाजिक प्रभाव: एक नई चुनौती
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। परिवारों में संवाद की कमी, युवाओं का अकेलापन और तेजी से बदलती lifestyle भी इस समस्या की जड़ में हो सकती है।
कई परिवार तब जागते हैं जब स्थिति गंभीर हो जाती है। यही वजह है कि जागरूकता और शुरुआती पहचान को जरूरी माना जा रहा है।
क्या शराबबंदी के बाद बदल गया नशे का स्वरूप?
विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सख्त नीति के बाद बाजार खुद को नए तरीके से ढाल लेता है। बिहार में भी चर्चा यही है कि शराब पर नियंत्रण के बाद कुछ अवैध नेटवर्क दूसरे रास्ते तलाशने लगे।
हालांकि यह कहना गलत होगा कि हर जगह स्थिति एक जैसी है, लेकिन जमीन पर उठ रहे सवाल सरकार, समाज और प्रशासन — तीनों के लिए संकेत हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार:
- स्कूल और कॉलेज में जागरूकता बढ़े
- परिवारों में खुली बातचीत हो
- समुदाय आधारित निगरानी मजबूत हो
- युवाओं के लिए खेल और कौशल कार्यक्रम बढ़ें
Ground Reality
बिहार में शराबबंदी के बाद नशे की बहस खत्म नहीं हुई है, बल्कि एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सवाल अब सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य का है — और यही सवाल भागलपुर की गलियों से लेकर दूसरे जिलों तक धीरे-धीरे तेज होता जा रहा है।




