भारत के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ, जनरल बिपिन रावत सिर्फ़ एक सैनिक नहीं थे, बल्कि रक्षा सुधारों के सबसे बड़े आर्किटेक्ट थे। उनका करियर साहस, निर्णायक सोच और जमीन से जुड़े नेतृत्व का प्रतीक था। लेकिन उनकी अचानक हुई मौत ने न केवल देश को सदमे में डाला, बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए — क्या यह सिर्फ़ एक हादसा था, या सिस्टम की नाकामियों की लंबी सूची का नतीजा?
कारगिल के बाद एक बदला हुआ अफ़सर
कारगिल युद्ध (1999) के बाद जब सेना को नए युग की चुनौतियों के लिए तैयार करना था, तब जनरल रावत ने साफ़ कहा था —
“भविष्य के युद्ध में जीत हथियारों से नहीं, सिस्टम और तालमेल से होगी।”
यह बयान उस समय के पारंपरिक सोच के खिलाफ था, लेकिन यही सोच आगे चलकर उनके ‘थियेटर कमांड’ और ‘इंटीग्रेटेड डिफेंस स्ट्रक्चर’ के विज़न की नींव बनी।
थियेटर कमांड का सपना और अदृश्य विरोध
2020 में CDS बनने के बाद उनका मिशन था — सेना, नौसेना और वायुसेना को एकजुट कर एक Unified War Command बनाना।
लेकिन सरकारी गलियारों में यह विचार कई ताक़तवर लॉबी को पसंद नहीं आया।
- नौकरशाही ने फाइल मूवमेंट को धीमा किया।
- कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने पब्लिक में समर्थन दिया, लेकिन अंदर ही अंदर विरोध जारी रखा।
- बजट अलॉटमेंट में लगातार कटौती हुई, जिससे प्रोजेक्ट की रफ़्तार कम हो गई।
यानी, देश के सबसे बड़े रक्षा सुधार को वही सिस्टम कमजोर कर रहा था, जिसके लिए यह बनाया जा रहा था।
सैनिकों का नेता, न कि सिर्फ़ एक अफ़सर
LOC के पोस्ट पर बिना प्रोटोकॉल के जाना, जवानों के साथ चाय पीना, और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुनना — यह सब उनके नेतृत्व को “मानव चेहरा” देता था।
एक रिटायर्ड मेजर ने हमें बताया,
“जनरल साहब आदेश देने वाले बॉस नहीं थे, वो वो इंसान थे जो आपकी पीठ पर हाथ रखकर कहते थे — मैं हूं।”
मधुलिका रावत के साथ ‘अदृश्य’ मिशन
जनरल और उनकी पत्नी मधुलिका रावत ने सैनिक परिवारों के लिए दर्जनों प्रोजेक्ट शुरू किए —
- वीर नारियों को रोजगार दिलाने के लिए सिलाई-हस्तशिल्प प्रशिक्षण।
- शहीद बच्चों की पढ़ाई के लिए फंडिंग।
- PTSD झेल रहे रिटायर्ड सैनिकों के लिए काउंसलिंग कैंप।
ये सारे काम बिना मीडिया की सुर्खियों में आए, चुपचाप चलते रहे।
अंतिम 48 घंटे और अधूरा प्रस्ताव
हादसे से दो दिन पहले, जनरल रावत ने एक महत्वपूर्ण Unified Logistics Command प्रस्ताव तैयार किया था।
इसमें सप्लाई, मेडिकल, ट्रांसपोर्ट, इंटेलिजेंस — सभी का एक केंद्रीकृत ढांचा बनाने की योजना थी।
सूत्र बताते हैं कि इसे अगले सप्ताह रक्षा मंत्रालय में प्रस्तुत किया जाना था, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।
सरकारी नाकामी का काला सच
जनरल रावत की मौत जिस हेलिकॉप्टर (Mi-17V5) में हुई, वह रूस निर्मित था और तकनीकी रूप से पुराना हो चुका था।
- सुरक्षा खामी 1: हेलिकॉप्टर में मौजूद टेरेन अवॉइडेंस सिस्टम को अपग्रेड करने की सिफ़ारिश 2019 में हुई थी, लेकिन फंडिंग न मिलने से यह टल गया।
- सुरक्षा खामी 2: मौसम अलर्ट सिस्टम का अपडेट देरी से मिला, जबकि तमिलनाडु के नीलगिरि इलाके में मौसम अचानक बदलने के लिए जाना जाता है।
- सुरक्षा खामी 3: हादसे के तुरंत बाद क्रैश साइट तक पहुंचने में बचाव टीम को 30-35 मिनट लगे — यह देरी पहाड़ी इलाकों में जानलेवा साबित होती है।
सरकार ने जांच रिपोर्ट को “closed” बताते हुए कहा कि यह ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ था, लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि सिस्टम ने उन्हें धोखा दिया।
जांच और सवाल जो दबा दिए गए
- क्या हेलिकॉप्टर का फ्लाइट प्लान बदलने का कारण सिर्फ़ मौसम था?
- क्या पायलट को अंतिम मिनटों में तकनीकी अलर्ट मिला था?
- क्या उस दिन का VIP movement protocol पर्याप्त था?
इन सवालों के जवाब शायद कभी आधिकारिक तौर पर नहीं मिलेंगे, क्योंकि जब रक्षा और राजनीति का मेल होता है, तो सच्चाई अक्सर फाइलों में दफ़न हो जाती है।
विरासत जो बची रहेगी
जनरल रावत का विज़न अधूरा रह गया, लेकिन उनकी सोच आज भी सैन्य रणनीति का हिस्सा है।
उन्होंने यह साबित किया कि साहस का मतलब सिर्फ़ दुश्मन से लड़ना नहीं, बल्कि सिस्टम से टकराकर बदलाव लाना भी है।
यह रिपोर्ट सिर्फ़ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस सच्चाई की दस्तावेज़ है जिसमें हम देख सकते हैं कि कैसे एक देश के शीर्ष सैनिक को भी सिस्टम की कमियों, धीमी नौकरशाही और राजनीतिक अनदेखी का सामना करना पड़ा।
जनरल रावत की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है — क्या हम अपने नेताओं की मौत को “हादसा” कहकर भूल जाने वाले देश हैं, या सच तक पहुँचने की हिम्मत रखने वाले नागरिक?





