बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची को लेकर राजनीति गर्मा गई है। राज्य भर में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (SIR) अभियान पर अब सवाल उठने लगे हैं। प्रमुख विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस ने इस अभियान में धांधली के आरोप लगाए हैं और इसे सत्ता पक्ष की “चालाकी” बताया है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे को ज़ोरशोर से उठाते हुए राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘वोट अधिकार यात्रा’ की शुरुआत कर दी है। यात्रा का उद्देश्य है—लोगों को उनके मताधिकार के प्रति जागरूक करना और यह सुनिश्चित करना कि किसी योग्य मतदाता का नाम सूची से न छूटे।
इस बीच, सभी दलों ने चुनावी तैयारियों में पूरी ताक़त झोंक दी है। जहां सत्तारूढ़ एनडीए सरकार अपनी योजनाओं और नीतियों को लेकर जनता के बीच जा रही है, वहीं विपक्ष इसे “नाकामी की गठरी” बता रहा है।
तेजस्वी यादव, जो राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, लगातार जनता के बीच जाकर अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनवा रहे हैं। उनका कहना है कि नीतीश सरकार सिर्फ़ पुराने वादे दोहराती रही, जबकि वास्तविक काम विपक्षी शासन के दौरान हुआ।
आरजेडी अब खुद को राज्य में सत्ता का वास्तविक दावेदार मान रही है। पार्टी ने साफ़ कर दिया है कि वह न सिर्फ़ एनडीए से, बल्कि प्रशांत किशोर की नवगठित राजनीतिक पार्टी से भी दो-दो हाथ करने को तैयार है।
तेजस्वी का कहना है, “बिहार को अब स्थिर नेतृत्व चाहिए, जो केवल घोषणाएं न करे, बल्कि ज़मीन पर काम करके दिखाए। जनता सब देख रही है और वक्त आने पर जवाब देगी।”
फिलहाल, राज्य की राजनीति दो मोर्चों पर लड़ रही है — एक तरफ़ गठबंधन और रणनीति की बुनियाद तैयार की जा रही है, वहीं दूसरी ओर जनता का विश्वास जीतने के लिए जुबानी जंग तेज़ होती जा रही है।




