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एक राष्ट्र, एक चुनाव पर फिर हलचल: अगली बैठक की तैयारी, क्या सच में बदल जाएगा भारत का चुनावी सिस्टम?

On: August 8, 2025 7:09 PM
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Naveen Kumar विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली

भारत में एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार द्वारा गठित रामनाथ कोविंद समिति की अगली बैठक जल्द ही होने जा रही है, और इस बार एजेंडा बड़ा साफ है — क्या 2029 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं?

इस बैठक को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज है, और आम जनता के मन में भी कई सवाल हैं:
क्या इससे चुनावों पर खर्च कम होगा?
क्या यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा या खतरे में डालेगा?
और सबसे जरूरी—क्या यह सिर्फ एक चुनावी चाल है?

 क्या है ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का प्रस्ताव?

यह विचार कहता है कि देशभर में लोकसभा, राज्य विधानसभा, नगर निकाय और पंचायत चुनाव एक साथ कराए जाएं। यानी हर 5 साल पर देश एक ही बार मतदान करे, और उसके बाद हर सरकार अपनी-अपनी अवधि पूरी करे।

 इसका तर्क क्या है?

  • बार-बार चुनाव से सरकारी खर्च बढ़ता है
  • आचार संहिता लागू होने से नीतिगत काम रुकते हैं
  • चुनावी प्रक्रिया में व्यापक प्रशासनिक तैनाती होती है

 रामनाथ कोविंद कमेटी क्या कर रही है?

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली इस उच्च स्तरीय कमेटी की पिछली बैठक में:

  • चुनाव आयोग, विधि आयोग और गृह मंत्रालय से राय ली गई थी
  • संवैधानिक संशोधन और राज्यों की सहमति को लेकर गंभीर चर्चा हुई थी
  • रिपोर्ट तैयार की जा रही है जिसे संसद में पेश किया जा सकता है

अब अगली बैठक में कार्य-योजना का मसौदा तय होने की संभावना है।

 क्या बदलेगा संविधान?

हाँ, अगर यह सिस्टम लागू होता है तो कम से कम 5 संवैधानिक संशोधन जरूरी होंगे:

  • अनुच्छेद 83, 172, 356 समेत कई अनुच्छेदों में संशोधन
  • कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव समय से पहले या बाद में कराना पड़ेगा
  • सभी राज्यों की सहमति भी जरूरी होगी

 क्या यह पहले हो चुका है भारत में?

जी हाँ! 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ हुए थे। लेकिन बाद में राज्यों में सरकारें टूटने लगीं, और यह तालमेल बिगड़ गया।

 विपक्ष क्या कह रहा है?

  • कांग्रेस, टीएमसी, DMK जैसी पार्टियों का कहना है कि:

“यह संघीय ढांचे पर हमला है। भारत जैसे विविध देश में एकसाथ चुनाव संभव नहीं।”

फायदा या नुकसान?

फायदानुकसान
खर्च की बचतसंवैधानिक पेच
नीतियों में निरंतरताराज्यों की स्वायत्तता पर असर
बार-बार चुनावी माहौल नहींक्षेत्रीय मुद्दों को दबाने का खतरा

एक राष्ट्र, एक चुनाव’ एक बड़ा और निर्णायक कदम हो सकता है — बशर्ते इसे ईमानदारी से लागू किया जाए। लेकिन सवाल ये भी है: क्या भारत इसके लिए तैयार है?

KhabarX Desk

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