युवा का राजनीति से कनेक्शन — नफ़रत, उम्मीद या बेपरवाही?
भारत की राजनीति में सबसे ज्यादा आबादी युवाओं की है, लेकिन सबसे कम भागीदारी भी उन्हीं की। सवाल ये है — क्या युवा राजनीति से नफ़रत करते हैं? क्या वो इससे कोई उम्मीद रखते हैं? या फिर ये सब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता?
क्या सोचते हैं आज के युवा?
आज का युवा स्मार्टफोन में सबकुछ देखता है — घोटाले, बयानबाज़ी, वादाखिलाफ़ी। ऐसे में जब उनसे पूछा जाए कि वे वोट क्यों नहीं करते, तो जवाब मिलता है:
“सब एक जैसे हैं।”
“हमारे वोट से क्या ही बदल जाएगा?”
“राजनीति गंदी चीज़ है।”
पर क्या वाकई ऐसा है?
राजनीति से दूरी — नफ़रत नहीं, निराशा है
ज़्यादातर युवाओं के दिल में राजनीति के लिए नफ़रत नहीं, बल्कि निराशा है। उन्हें ये सिस्टम टूटा हुआ लगता है। वादे तो सब करते हैं, लेकिन निभाता कोई नहीं।
कई युवा एक्टिव होना चाहते हैं, बदलाव लाना चाहते हैं, लेकिन परिवार, सोशल प्रेशर और सिस्टम की उलझनों से पीछे हट जाते हैं।
उम्मीद भी है, बदलाव भी
हाल के कुछ सालों में युवा नेतृत्व ने यह भी साबित किया है कि बदलाव मुमकिन है। चाहे वह स्टूडेंट मूवमेंट्स हों, पर्यावरण को लेकर कैम्पेन हों, या सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल अवेयरनेस — युवा अब आवाज़ उठाने लगे हैं।
दिल्ली, बंगाल, केरल जैसे राज्यों में कई युवा नेता सामने आए हैं जो शिक्षा, रोजगार और तकनीकी नीतियों पर बात कर रहे हैं।
बेपरवाही या मजबूरी?
कई बार जो बेपरवाही दिखती है, वो थकान और असहायता से आती है।
“हम बोलें भी तो क्या फर्क पड़ेगा?” — ये सोच उन्हें खामोश कर देती है।
पर असल में ये खामोशी ही सबसे बड़ा खतरा है — क्योंकि लोकतंत्र में चुप रहना भी एक चुनाव होता है।
क्या करना चाहिए?
युवाओं को पॉलिटिक्स को “गंदा” मानने के बजाय reform करने की कोशिश करनी चाहिए
वोटिंग को एक मज़बूरी नहीं, बल्कि अधिकार समझना चाहिए
सोशल मीडिया से आगे बढ़कर ग्राउंड लेवल पर लोकल मुद्दों को समझना और उठाना चाहिए
एजुकेशन सिस्टम में राजनीति की समझ और नागरिक शास्त्र को प्रैक्टिकल रूप में पढ़ाया जाना चाहिए
अंत में सवाल:
क्या आप भी राजनीति से दूर हैं? या अब वक्त आ गया है कि आप भी बदलाव का हिस्सा बनें?
KhabarX पर हम युवा सोच, ज़रूरत और ज़मीन की बात करते हैं —
क्योंकि बदलाव तब आता है जब आप सिर्फ देखते नहीं, सवाल करते हैं।




