अप्रैल–मई 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए केवल एक और चुनावी पड़ाव नहीं, बल्कि राजनीतिक साख की बड़ी परीक्षा माने जा रहे हैं। केरल, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल—इन चार राज्यों में वोटिंग होनी है और पार्टी नेतृत्व इसे 2026 की शुरुआत जीत के साथ करने का अवसर मान रहा है। दिल्ली और बिहार में हालिया हार के बाद कांग्रेस को कम से कम एक मजबूत जीत की दरकार है, ताकि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता फिर से स्थापित की जा सके।
केरल में कांग्रेस को अपेक्षाकृत बेहतर माहौल की उम्मीद है। दिसंबर 2025 के स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 38 प्रतिशत से अधिक संयुक्त वोट शेयर हासिल किया। यह प्रदर्शन पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है। राज्य में हालांकि मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर शशि थरूर और रमेश चेन्निथला के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा की चर्चा रही, लेकिन फिलहाल नेतृत्व ने “सामूहिक नेतृत्व” की रणनीति अपनाने का संकेत दिया है। चेन्निथला को चुनाव अभियान का नेतृत्व सौंपा गया है, जबकि थरूर को डिप्टी की भूमिका दी गई है। हाल के महीनों में थरूर और केंद्रीय नेतृत्व के बीच दूरी की अटकलें भी लगी थीं, लेकिन संसद में राहुल गांधी के समर्थन ने इन चर्चाओं को कुछ हद तक शांत किया है। अगर आंतरिक एकजुटता बनी रहती है तो केरल कांग्रेस के लिए सबसे मजबूत दांव साबित हो सकता है।

तमिलनाडु में तस्वीर अलग है लेकिन उम्मीदें यहां भी कम नहीं हैं। कांग्रेस सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के साथ गठबंधन में है और गठबंधन को लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद है। हालांकि सीट-बंटवारे को लेकर बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है और कुछ बयानों ने गठबंधन में असहजता पैदा की है। कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा सरकार में सक्रिय भूमिका की मांग ने DMK को नाराज किया है। सूत्रों के अनुसार DMK तब तक सीटों पर चर्चा नहीं करना चाहती जब तक कांग्रेस अपने नेताओं के बयानों पर स्पष्ट रुख न अपनाए। इस बीच अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम के साथ संभावित नए समीकरणों की फुसफुसाहट भी चल रही है, हालांकि कांग्रेस की राज्य इकाई ने इन अटकलों को खारिज किया है। पिछले चुनावी आंकड़े देखें तो 2021 में कांग्रेस ने 18 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को केवल चार सीटें मिली थीं। ऐसे में अगर गठबंधन कायम रहता है तो कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जा रही है।
असम और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के सामने तस्वीर कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। असम में पार्टी को 29 सीटों का बचाव करना है, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं माना जा रहा। राज्य इकाई के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा के इस्तीफे और भाजपा में संभावित शामिल होने की खबरों ने संगठन को झटका दिया है। नेतृत्व स्तर पर बातचीत से फिलहाल स्थिति संभाली गई है, लेकिन यह विवाद चुनावी तैयारियों पर असर डाल सकता है। कांग्रेस के लिए यहां रणनीति शायद तत्काल सत्ता परिवर्तन से अधिक अपने आधार को बचाए रखने और दीर्घकालिक मजबूती पर केंद्रित रह सकती है।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने एक बार फिर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 91 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर भी घटा। राज्य इकाई के नेतृत्व में बदलाव के बावजूद तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जैसी मजबूत पार्टियों के सामने कांग्रेस की राह कठिन दिखती है। हालांकि पार्टी के पास खोने को बहुत कम है, इसलिए वह जोखिम लेकर स्वतंत्र लड़ाई लड़ने की रणनीति अपना रही है।
पिछले कुछ वर्षों के चुनावी अनुभव कांग्रेस के लिए चेतावनी भी हैं। हरियाणा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आंतरिक खींचतान ने पार्टी की संभावित जीत को नुकसान पहुंचाया था। नेतृत्व के भीतर असहमति और गठबंधन सहयोगियों के साथ तालमेल की कमी कई बार भारी पड़ी है। ऐसे में 2026 के इन चार राज्यों में सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी कितनी एकजुट रहती है और अपने सहयोगियों के साथ तालमेल कैसे साधती है।

कुल मिलाकर शुरुआती 2026 कांग्रेस के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आ रहा है। केरल और तमिलनाडु में उम्मीदें मजबूत हैं, जबकि असम और बंगाल में राह कठिन है। यदि पार्टी आंतरिक मतभेदों को नियंत्रित रख पाती है और रणनीतिक स्पष्टता के साथ चुनाव मैदान में उतरती है, तो कम से कम एक या दो राज्यों में जीत दर्ज कर सकती है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस इन चुनावों को वापसी की सीढ़ी बना पाती है या नहीं।




