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मनरेगा कानून में बड़ा बदलाव: लोकसभा में ‘जी राम जी’ विधेयक पास, मजदूरों के अधिकार पर उठे सवाल

मनरेगा कानून - केंद्र सरकार ने शीतकालीन सत्र के आख़िरी दिनों में एक ऐसा विधेयक लोकसभा में पेश किया, जिसने ग्रामीण भारत, मज़दूर अधिकार और संसद की भूमिका - तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जिस मनरेगा कानून को वर्ष 2005 में सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उसे बहुमत के बल पर बदल दिया गया। विपक्ष की मांग थी कि इस विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजा जाए, ताकि इसके प्रावधानों की गहन जांच हो सके, लेकिन सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया।नए विधेयक के तहत ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम’ का नाम बदलकर ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ कर दिया गया है, जिसे संक्षेप में ‘जी राम जी’ कहा जा रहा है। इस बदलाव के साथ न केवल महात्मा गांधी का नाम हटाया गया, बल्कि कानून की मूल भावना - काम का कानूनी अधिकार - पर भी प्रश्नचिह्न लग गया।

बहस से बचता हुआ विधेयक

12 दिसंबर को कैबिनेट की मंजूरी, 15 दिसंबर को कार्यसूची में शामिल, 16 दिसंबर को पेश और 18 दिसंबर को लोकसभा से पारित - इतने कम समय में इस विधेयक को पास किया गया कि देश के लगभग 12 करोड़ मनरेगा मज़दूरों तक इसकी जानकारी ही नहीं पहुंच सकी। विपक्षी सांसदों ने वेल में उतरकर विरोध किया, नारे लगाए और विधेयक की प्रतियां तक फाड़ी गईं। इसके बाद लोकसभा की कार्यवाही 19 दिसंबर तक स्थगित कर दी गई।

अधिकार से योजना की ओर

मनरेगा एक डिमांड-ड्रिवन कानून था - यानी मज़दूर काम मांगता था और सरकार उसे काम देने के लिए बाध्य थी। नए विधेयक में यह गारंटी कमजोर होती दिख रही है। सेक्शन 5 और सेक्शन 37 जैसे प्रावधान संकेत देते हैं कि अब रोज़गार उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित रहेगा, जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी। इससे सार्वभौमिक कानूनी अधिकार का विचार लगभग समाप्त हो जाता है।

फंडिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव

अब तक मनरेगा में केंद्र सरकार 90 प्रतिशत और राज्य 10 प्रतिशत खर्च वहन करते थे। नए ढांचे में यह अनुपात 60:40 कर दिया गया है। इसका सीधा असर राज्यों की वित्तीय सेहत पर पड़ेगा। कई राज्य पहले से ही जीएसटी बकाया और सीमित संसाधनों से जूझ रहे हैं। ऐसे में 40 प्रतिशत हिस्सा देना उनके लिए मुश्किल होगा, और परिणामस्वरूप योजना ठंडे बस्ते में जा सकती है।

125 दिन का वादा, 50 दिन की हकीकत

सरकार दावा कर रही है कि नए कानून के तहत रोज़गार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 कर दिए जाएंगे। लेकिन ‘द हिंदू’ और ‘हिंदू बिज़नेस लाइन’ के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविकता यह है कि औसतन प्रति परिवार केवल 50–55 दिन का ही काम मिल पा रहा है। वित्त वर्ष 2025–26 में मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, लेकिन नए फंडिंग फॉर्मूले के कारण राज्यों पर लगभग 28,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आएगा।

ग्राम पंचायतों की भूमिका कमजोर

सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास और अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि नए कानून में ग्राम पंचायतों की भूमिका कमजोर होती है। पीएम गतिशक्ति, जीआईएस मैपिंग और केंद्रीय टेम्पलेट्स पर ज़ोर दिया गया है, जहां गरिमा की जगह डेटा पॉइंट ले लेते हैं। इसे सुधार नहीं, बल्कि अधिकारों का रोल-बैक बताया जा रहा है।

खेती, मज़दूरी और ग्रामीण संतुलन

नए प्रावधानों में खेती के सीज़न के दौरान 60 दिनों तक रोज़गार न मिलने की आशंका जताई जा रही है। जबकि नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट में कहा गया था कि मनरेगा के कारण खेती के मौसम में मज़दूरों की उपलब्धता पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसके उलट, नए कानून से ग्रामीण मज़दूरी दर पर दबाव बढ़ने और मज़दूरों की मोलभाव की ताकत कम होने की आशंका है।

विरोध और अपील

राज्यसभा सांसद मनोज झा ने सभी सांसदों को पत्र लिखकर अपील की कि मनरेगा एक साझा संवैधानिक दायित्व का परिणाम है, जिसे इस तरह निरस्त नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यह कानून केवल एक योजना नहीं, बल्कि काम के अधिकार की कानूनी गारंटी था, जिसने करोड़ों परिवारों को संकट के समय सहारा दिया।

यह विधेयक केवल नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है। यह अधिकार बनाम अनुदान, केंद्र बनाम राज्य और गरिमा बनाम प्रशासनिक नियंत्रण की बहस को सामने लाता है। सवाल यही है - क्या नाम बदल देना ही विकास है? और क्या बहुमत के दम पर किसी सर्वसम्मत कानून को बदल देना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप है?

इन सवालों के जवाब आने वाले समय में ग्रामीण भारत की दिशा तय करेंगे।

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Mission Aditya
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Founder – KhabarX Building an independent media platform where facts matter more than noise. Amplifying unheard stories, questioning silence, and creating journalism powered by truth, technology, and the next generation of changemakers.

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