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भारत में बलात्कार अपराध: कड़े कानूनों के बावजूद अपराधियों में डर क्यों नहीं?

On: January 10, 2026 8:35 PM
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राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में औसतन हर दिन 85–90 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। यह संख्या स्वयं में गंभीर है, लेकिन विशेषज्ञों और नीति विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि सामाजिक दबाव, बदनामी का डर, पुलिस प्रक्रिया की जटिलता और न्याय में देरी के कारण बड़ी संख्या में मामले रिपोर्ट ही नहीं होते। यह स्थिति एक मूल प्रश्न खड़ा करती है—जब कानून सख्त हैं, सज़ाएं कड़ी हैं और विशेष प्रावधान मौजूद हैं, तो फिर अपराधियों में भय क्यों नहीं दिखता?

काग़ज़ पर सख्ती, ज़मीन पर असर क्यों नहीं?

2013 के बाद भारत में बलात्कार से जुड़े कानूनों को लगातार कठोर बनाया गया। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 और 2018 के तहत सज़ाओं की सीमा बढ़ी, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की बात हुई और कुछ मामलों में मृत्युदंड तक का प्रावधान जोड़ा गया।
लेकिन डेटा-आधारित मूल्यांकन यह दिखाता है कि केवल सज़ा की कठोरता अपराध रोकने में पर्याप्त नहीं रही।

कानून तब प्रभावी deterrent बनता है जब अपराधी को यह भरोसा हो कि अपराध के बाद सज़ा निश्चित और शीघ्र मिलेगी। भारत में समस्या यहीं से शुरू होती है।

कारावास क्यों नहीं बन पाया प्रभावी डर?

नीति विशेषज्ञों के अनुसार, कारावास तभी निवारक (deterrent) बनता है जब: गिरफ्तारी की संभावना अधिक हो जांच तेज़ और निष्पक्ष हो मुकदमे का निपटारा समयबद्ध हो दोषसिद्धि की दर पर्याप्त हो

भारत में बलात्कार मामलों में इन चारों स्तरों पर कमजोरियाँ देखी जाती हैं। अपराधी अक्सर यह मानकर चलते हैं कि मामला दर्ज भी हुआ तो जांच लंबी चलेगी, गवाह टूटेंगे, और अंततः दोषसिद्धि की संभावना कम रहेगी।

    जांच और ट्रायल में देरी: सबसे बड़ी बाधा

    राष्ट्रीय और राज्य स्तर के न्यायिक आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार से जुड़े मामलों में: जांच महीनों तक खिंच जाती है चार्जशीट दाखिल होने में देरी होती है ट्रायल वर्षों तक चलता हैफास्ट ट्रैक कोर्ट्स की घोषणा तो हुई, लेकिन जजों की कमी, अभियोजन की कमजोर तैयारी और केस मैनेजमेंट की कमी के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए।न्याय में देरी का सीधा असर पीड़ित पर पड़ता है—वह मानसिक, सामाजिक और आर्थिक दबाव में टूटती है, जबकि आरोपी अक्सर ज़मानत पर बाहर रहता है।

    कम दोषसिद्धि दर: सख्त कानून का विरोधाभास

    कानून चाहे जितना सख्त हो, अगर दोषसिद्धि दर कम रहेगी तो उसका निवारक प्रभाव सीमित रहेगा। बलात्कार मामलों में कम conviction rate के पीछे कई कारण सामने आते हैं: कमजोर या देर से मेडिकल एविडेंस पुलिस जांच में प्रक्रियागत त्रुटियाँ अभियोजन की अपर्याप्त तैयारी गवाहों का hostile होना यह स्थिति अपराधियों को यह संदेश देती है कि कानून का डर व्यावहारिक नहीं है

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    सरकार किन अतिरिक्त उपायों पर विचार कर सकती है?

    नीति-स्तर पर यह स्पष्ट होता जा रहा है कि केवल मौजूदा कानूनों को दोहराना पर्याप्त नहीं है। कुछ ठोस और विवादास्पद, लेकिन गंभीर विचार की मांग करने वाले विकल्प सामने रखे जा रहे हैं:

    1. अत्यंत जघन्य मामलों में बिना पैरोल आजीवन कारावास
    कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि विशेष श्रेणी के मामलों में, जहां अपराध की प्रकृति अत्यधिक क्रूर हो, वहां पैरोल-रहित आजीवन कारावास पर स्पष्ट नीति बनाई जा सकती है।

    2. समयबद्ध ट्रायल और न्यायिक जवाबदेही
    केवल फास्ट ट्रैक कोर्ट घोषित करना पर्याप्त नहीं। जांच, चार्जशीट और ट्रायल—तीनों के लिए कानूनी समयसीमा और उसकी निगरानी जरूरी है।

    3. राष्ट्रीय सेक्स-ऑफेंडर रजिस्ट्री
    एक सुरक्षित, नियंत्रित और कानून-सम्मत नेशनल सेक्स ऑफेंडर रजिस्ट्री अपराध की पुनरावृत्ति रोकने में सहायक हो सकती है, बशर्ते इसका दुरुपयोग न हो और स्पष्ट डेटा सुरक्षा नियम हों।

    4. पुलिस जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना
    गलत या लापरवाह जांच पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित किए बिना सिस्टम में सुधार संभव नहीं। जांच की गुणवत्ता सीधे सज़ा की संभावना से जुड़ी है।

    Farhan Ahmad

    Farhan Ahmad KhabarX में एक dedicated रिपोर्टर हैं, जो Bihar से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्ट्स, crime updates और civic issues पर गहरी नज़र रखते हैं। सरल भाषा, तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग और बिना सनसनी के साफ पत्रकारिता उनकी पहचान है। उनका फोकस हमेशा public interest, transparency और verified information पर रहता है।

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