पटना / बिहार (ग्राउंड रिपोर्ट): बिहार में ट्रैफिक नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में ऑटोमैटिक ट्रैफिक एनफोर्समेंट सिस्टम (ATES) लगाया गया है। बड़े शहरों से लेकर प्रमुख चौराहों तक हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे लगे हैं। लेकिन आम लोगों के मन में आज भी एक बड़ा सवाल है क्या चालान कैमरा खुद काटता है या कंट्रोल रूम में बैठी पुलिस?
बिहार का ट्रैफिक कैमरा सिस्टम कैसे काम करता है?
बिहार के प्रमुख शहरों जैसे पटना, गया, मुज़फ्फरपुर और भागलपुर में ट्रैफिक कैमरे दो स्तरों पर काम करते हैं—
- सड़क पर लगे कैमरे और सेंसर
- इंटीग्रेटेड ट्रैफिक कंट्रोल रूम
ये सिस्टम बिहार ट्रैफिक पुलिस के अधीन होता है, हालांकि तकनीकी संचालन में कई जगह निजी कंपनियों की भूमिका भी होती है।
कैमरे की भूमिका क्या होती है?
कैमरा केवल उल्लंघन को रिकॉर्ड करता है, जैसे रेड लाइट जंप हेलमेट या सीट बेल्ट न पहनना ओवरस्पीडिंग गलत लेन में वाहन चलाना स्टॉप लाइन क्रॉस करना कैमरा वाहन का नंबर प्लेट, समय, तारीख और लोकेशन रिकॉर्ड करता है।
फिर चालान कैसे कटता है?
- उल्लंघन की पहचान
कैमरा नियम तोड़ते हुए वाहन को रिकॉर्ड करता है। - कंट्रोल रूम में जांच
कंट्रोल रूम में तैनात ट्रैफिक पुलिस या प्रशिक्षित स्टाफ—- फोटो/वीडियो देखता है
- नंबर प्लेट साफ़ है या नहीं, यह जांचता है
- तकनीकी गलती या इमरजेंसी वाहन की पहचान करता है
- पुलिस की मंज़ूरी
जांच के बाद ही चालान सिस्टम में अप्रूव होता है और
ई-चालान पोर्टल पर अपलोड किया जाता है।
क्या पुलिस मनमाने तरीके से चालान काट सकती है
नहीं।
बिहार ट्रैफिक पुलिस की मानक प्रक्रिया (SOP) के अनुसार—
- हर ई-चालान के साथ डिजिटल सबूत अनिवार्य है
- बिना फोटो या वीडियो के चालान कानूनी रूप से मान्य नहीं
अगर सबूत गलत है या वाहन ने नियम नहीं तोड़ा, तो चालान को रद्द कराया जा सकता है।

अगर गलत चालान आ जाए तो क्या करें?
ई-चालान वेबसाइट पर सबूत देखें echallan.parivahan.gov.in ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें बिहार ट्रैफिक पुलिस या परिवहन पोर्टल पर ट्रैफिक कोर्ट में चुनौती दें लिखित आवेदन के साथ बिहार में कई मामलों में गलत चालान रद्द भी हुए हैं, यह रिकॉर्ड में है।
लोगों में भ्रम क्यों है?
ग्राउंड रिपोर्टिंग में सामने आए मुख्य कारण—SMS तुरंत आ जाता है, इसलिए लगता है मशीन ने चालान काट दिया मौके पर पुलिस नहीं दिखती, फिर भी चालान आ जाता है सिस्टम की जानकारी जनता तक ठीक से नहीं पहुंची
क्या यह सिस्टम कानूनी है?
हाँ, पूरी तरह कानूनी है। यह सिस्टम मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (संशोधित 2019) के तहत मान्य है अदालतें डिजिटल सबूत आधारित चालान को स्वीकार करती हैंशर्त सिर्फ एक है—सबूत स्पष्ट और जांच योग्य होना चाहिए।
ज़मीनी सच्चाई: सिस्टम में कमी कहाँ है?
ग्राउंड लेवल पर कुछ समस्याएँ साफ दिखती हैं—कई जगह कैमरे का एंगल सही नहीं रात में फोटो स्पष्ट नहीं होती नंबर प्लेट मानक के अनुसार नहीं लोगों को नियमों की पूरी जानकारी नहीं समस्या सिस्टम से ज़्यादा जागरूकता और पारदर्शिता की है।





