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बिहार वोटर लिस्ट पुनरीक्षण में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिकों के नाम मिलने का खुलासा, सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा मामला

On: July 30, 2025 12:06 PM
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पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के तहत चल रहे घर-घर सर्वेक्षण के दौरान एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। निर्वाचन आयोग के सूत्रों के अनुसार, इस सर्वे में पाया गया है कि नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों के कई नागरिक बिहार में रह रहे हैं और उन्होंने अवैध तरीकों से भारतीय दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र और राशन कार्ड हासिल कर लिए हैं।

1 अगस्त से 30 अगस्त तक होगी गहन जांच
ब्लॉक स्तर के अधिकारी (BLO) जो घर-घर जाकर सर्वे कर रहे हैं, उन्होंने ऐसे कई संदिग्ध मामलों की पहचान की है। अब इन मामलों की गहन जांच आगामी 1 अगस्त से 30 अगस्त के बीच की जाएगी। यदि जांच में आरोप सही पाए गए, तो इन फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे

राजनीतिक घमासान और विपक्ष के आरोप
इस खुलासे के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। आरजेडी और कांग्रेस ने इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर आरोप लगाया है कि यह एक साज़िश है जिसके तहत जानबूझकर मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। वहीं बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा है कि अगर असली और नकली मतदाताओं की पहचान की जा रही है तो विपक्ष को तकलीफ क्यों हो रही है?

2003 के बाद पहली बार हो रहा इतना बड़ा पुनरीक्षण
यह विशेष पुनरीक्षण 24 जून से शुरू हुआ था और इसका उद्देश्य योग्य नागरिकों के नाम जोड़ना और अयोग्य नाम हटाना है। पिछली बार ऐसा पुनरीक्षण बिहार में 2003 में किया गया था। आयोग का कहना है कि शहरीकरण, पलायन, नई उम्र के मतदाता, मृत्यु की रिपोर्टिंग न होना और विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम जुड़ जाना इस प्रक्रिया को आवश्यक बनाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, कई याचिकाएं दाखिल
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। आरजेडी सांसद मनोज झा, ADR, PUCL, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा और पूर्व विधायक मुजाहिद आलम सहित कई याचिकाकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया को चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “आपका समय गलत है”
गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा की जा रही प्रक्रिया में कोई गलती नहीं है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसका समय चिंता का विषय है। कोर्ट ने कहा, “इतनी बड़ी जनसंख्या (लगभग आठ करोड़) पर इस तरह की सघन समीक्षा करना और चुनाव से पहले उसे पूरा करना मुश्किल है।” साथ ही यह भी आशंका जताई कि कई असली मतदाता भी हट सकते हैं और उन्हें अपील करने का समय नहीं मिलेगा

आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं
निर्वाचन आयोग ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, जिस पर कोर्ट ने कहा कि आधार, राशन कार्ड और निर्वाचन आयोग द्वारा जारी पहचान पत्र को पुन: सत्यापन के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए

 

KhabarX Desk

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