सिंधु जल संधि पर हेग की अदालत का बड़ा फैसला, कहा- भारत इसे एकतरफा नहीं रोक सकता; नई दिल्ली ने ठुकराया आदेश

हेग की स्थायी मध्यस्थता अदालत ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी लागू है और भारत इसे एकतरफा तौर पर निलंबित नहीं कर सकता। भारत ने फैसले को खारिज कर दिया।

सिंधु जल संधि पर हेग की अदालत का बड़ा फैसला, कहा- भारत इसे एकतरफा नहीं रोक सकता; नई दिल्ली ने ठुकराया आदेश

नई दिल्ली/इस्लामाबाद: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) ने कहा है कि भारत इस करीब 60 साल पुरानी जल संधि को अपनी मर्जी से एकतरफा तौर पर रोक नहीं सकता। अदालत ने साफ किया कि संधि अभी भी लागू है और इसके तहत भारत और पाकिस्तान दोनों की जिम्मेदारियां बनी हुई हैं। पांच सदस्यों वाली मध्यस्थता अदालत ने सोमवार को सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। अदालत ने खास तौर पर कहा कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को उन नियमों का पालन करना होगा जो पाकिस्तान की ओर बहने वाली नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से जुड़े हैं। हालांकि, इस फैसले को लेकर एक अहम पेच भी है। भारत ने इस पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया को ही मानने से इनकार किया था। नई दिल्ली ने अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए और सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया। फैसला आने के बाद विदेश मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए PCA को "अवैध रूप से गठित" बताया है।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि रोकी थी

भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को "abeyance" में रखने का फैसला किया था। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी। भारत ने कहा था कि संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को "विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय" तरीके से खत्म नहीं करता। पाकिस्तान ने पहलगाम हमले में किसी भी तरह की भूमिका से इनकार किया है। इसके बाद सिंधु नदी के पानी को लेकर दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ गया। पाकिस्तान ने मार्च 2026 में हेग स्थित मध्यस्थता अदालत का रुख किया और संधि की मौजूदा कानूनी स्थिति पर फैसला देने की मांग की। अदालत ने भारत को भी सुनवाई में शामिल होने का मौका दिया, लेकिन नई दिल्ली ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। 26 से 28 अप्रैल 2026 के बीच हेग के पीस पैलेस में सुनवाई हुई, जिसमें पाकिस्तान ने अपना पक्ष रखा। अदालत ने अपने फैसले में उन आधारों पर भी विचार किया, जिनका हवाला भारत ने संधि को स्थगित करने के लिए दिया था। इनमें भारत की संप्रभुता, संधि पर दोबारा बातचीत के लिए पाकिस्तान की कथित अनिच्छा, सीमा पार आतंकवाद और बदलती परिस्थितियां शामिल थीं। बदलती परिस्थितियों में बढ़ती आबादी, स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को भी भारत की ओर से उठाया गया था। अदालत ने इन तर्कों को संधि को एकतरफा तौर पर रोकने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। फैसले में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश को केवल अपनी संप्रभुता का हवाला देकर किसी संधि को एकतरफा तरीके से निलंबित करने की सामान्य अनुमति नहीं देता। फैसला आने के बाद पाकिस्तान ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक और कानूनी जीत बताया। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि अदालत ने भारत के सिंधु जल संधि को स्थगित करने के फैसले को स्वीकार नहीं किया है। डार ने कहा कि संधि दोनों देशों के लिए बाध्यकारी है और भारत को इसके तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इस मुद्दे को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में उठाया। उन्होंने कहा कि पानी क्षेत्र के लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा है और इसे राजनीतिक दबाव बनाने या हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। पाकिस्तान के लिए यह मुद्दा खास तौर पर संवेदनशील है, क्योंकि उसकी कृषि और सिंचाई व्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है।

भारत ने कहा- फैसला स्वीकार नहीं

नई दिल्ली ने अदालत के फैसले को तुरंत खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने PCA को "अवैध रूप से गठित" बताते हुए कहा कि भारत का संधि को स्थगित रखने का फैसला प्रभावी है। भारत का रुख है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवादी हमलों के समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से खत्म नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को लेकर उसका फैसला जारी रहेगा। इससे साफ है कि अदालत का फैसला आने के बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद खत्म होने वाला नहीं है। एक तरफ पाकिस्तान अब इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है, वहीं भारत PCA की प्रक्रिया को ही मान्यता नहीं दे रहा है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, फैसले से पाकिस्तान का पक्ष जरूर मजबूत हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को तुरंत अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ अहमर बिलाल सूफी ने कहा कि फैसले से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत आगे के संभावित कदमों के लिए एक स्पष्ट कानूनी आधार मिला है।लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के प्रोफेसर सिकंदर अहमद शाह ने भी कहा कि भारत का सुनवाई में शामिल नहीं होना अपने आप में अदालत के फैसले को बेअसर नहीं करता। हालांकि, इस मामले में किसी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आदेश जैसी सीधी प्रवर्तन व्यवस्था नहीं है। यानी फिलहाल फैसला पाकिस्तान के पक्ष में एक मजबूत कानूनी दस्तावेज जरूर है, लेकिन इसे जमीन पर लागू करवाना आसान नहीं होगा।Indus : सिंधु जल समझौता: भारत ने हेग कोर्ट का फैसला ठुकराया - Hindi Vaartha

स्थायी सिंधु आयोग की बैठक पर भी नजर

पाकिस्तान अब दोनों देशों के बीच तकनीकी बातचीत और स्थायी सिंधु आयोग की गतिविधियां फिर शुरू करने की मांग कर रहा है। यह आयोग संधि से जुड़े रोजमर्रा के मामलों, सूचनाओं के आदान-प्रदान और तकनीकी मुद्दों पर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच संपर्क का माध्यम है। पाकिस्तान का कहना है कि आयोग की बैठक मई 2022 के बाद से नहीं हुई है। उसका यह भी दावा है कि भारत ने 2023 से नियमित नदी प्रवाह के आंकड़े साझा करना और कुछ परियोजनाओं के निरीक्षण की अनुमति देना बंद कर दिया है। दूसरी ओर, पानी के मुद्दे पर पाकिस्तान में जिस तरह की चिंता दिखाई जा रही है, उसे लेकर कुछ विशेषज्ञों की राय अलग है। जल विशेषज्ञ हसन अब्बास का कहना है कि पश्चिमी नदियों का प्रवाह केवल संधि पर निर्भर नहीं है। भौगोलिक परिस्थितियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। उनके मुताबिक, भारत की कई जलविद्युत परियोजनाओं में पानी को लंबे समय तक रोककर रखने की क्षमता सीमित है। इसलिए भारत के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी को पूरी तरह रोक देना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं होगा। फिलहाल सिंधु जल संधि पर कानूनी लड़ाई का एक दौर पाकिस्तान के पक्ष में गया है, लेकिन भारत के फैसले से साफ है कि विवाद अभी जारी रहेगा। आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि दोनों देशों के बीच तकनीकी बातचीत और नदी के पानी से जुड़े आंकड़ों का आदान-प्रदान दोबारा शुरू होता है या नहीं।

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