सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर जमानत दिलाने की कोशिश, सुकेश चंद्रशेखर को 8 साल की सजा

दिल्ली की अदालत ने सुकेश चंद्रशेखर को सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर जमानत मामले में दखल देने की कोशिश के लिए आठ साल की जेल की सजा सुनाई है। कोर्ट ने उसके कृत्य को न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और कानून के शासन पर गंभीर हमला बताया।

ठगी के मामलों में आरोपी सुकेश चंद्रशेखर को दिल्ली की एक अदालत ने आठ साल की जेल की सजा सुनाई है। मामला 2017 का है, जब पुलिस हिरासत में रहते हुए चंद्रशेखर ने कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के एक जज की पहचान का इस्तेमाल कर एक विशेष न्यायाधीश पर जमानत देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की थी।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने 29 अगस्त को जारी अपने आदेश में कहा कि यह सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने का मामला नहीं था। चंद्रशेखर ने देश की सर्वोच्च अदालत के एक जज की पहचान इसलिए बनाई ताकि एक चल रही न्यायिक कार्यवाही को अपने पक्ष में प्रभावित किया जा सके।

अदालत ने उसे तीन अलग-अलग अपराधों में सजा सुनाई है। सार्वजनिक सेवक का रूप धारण करने के लिए दो साल की कठोर कैद, सार्वजनिक सेवक को धमकी देने के लिए दो साल और गुमनाम संचार के जरिए आपराधिक धमकी देने के मामले में चार साल की सजा दी गई। इन तीनों सजाओं को एक साथ चलाने के बजाय लगातार चलाने का आदेश दिया गया है। इस वजह से कुल सजा आठ साल की बनती है।

इससे पहले 20 अगस्त को अदालत ने चंद्रशेखर को IPC की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया था।

मामला अप्रैल 2017 का है। उस समय सुकेश चंद्रशेखर एक भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस की हिरासत में था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, उसने पुलिस कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया और उस फोन से तत्कालीन विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी से संपर्क किया। चौधरी उस समय Prevention of Corruption Act से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थीं।

जांच के मुताबिक, चंद्रशेखर ने बातचीत के दौरान पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज के निजी सचिव के तौर पर पेश किया। इसके बाद उसने खुद को वही जज बताते हुए जमानत देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की। उसने जल्द से जल्द जमानत देने की बात कही और ऐसा नहीं करने पर न्यायाधीश को पेशेवर स्तर पर नुकसान पहुंचने की धमकी भी दी।

अदालत ने अपने आदेश में इस पूरे मामले को बेहद गंभीर बताया। जज ने कहा कि किसी सुप्रीम कोर्ट जज की पहचान बनाकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश सीधे तौर पर न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है।

कोर्ट ने यह भी माना कि चंद्रशेखर अपनी कोशिश में सफल नहीं हो पाया। लेकिन इससे अपराध की गंभीरता कम नहीं होती। अदालत के मुताबिक, न्यायाधीश का धोखे में नहीं आना सिर्फ इस बात को दिखाता है कि कोशिश सफल नहीं हुई, यह नहीं कि कोशिश अपने आप में मामूली थी।

सजा पर सुनवाई के दौरान अदालत ने चंद्रशेखर के रवैये को लेकर भी टिप्पणी की। आदेश में कहा गया कि उसने अपने किए पर कोई वास्तविक पछतावा नहीं दिखाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुकदमे की सुनवाई अंतिम दौर में पहुंचने के दौरान उसने अदालत के खिलाफ बदनाम करने वाला अभियान चलाने की कोशिश की, जिससे कार्यवाही में देरी या उसे प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता था।

इस मामले में अदालत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक के बढ़ते इस्तेमाल का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि आने वाले समय में AI से बनाई गई आवाज, तस्वीर, वीडियो और दूसरे संचार माध्यमों के जरिए नकली और असली संदेश में फर्क करना और मुश्किल हो सकता है।

अदालत ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल अगर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया जाता है तो न्याय व्यवस्था को इससे निपटने के लिए तैयार रहना होगा। जज हर्षिता मिश्रा ने ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाने की जरूरत बताई।

कोर्ट ने अलग-अलग धाराओं में मिली सजाओं को लगातार चलाने का फैसला भी इसी वजह से किया। अदालत के मुताबिक, तीनों अपराधों की प्रकृति अलग थी और उनका संयुक्त असर न्याय प्रशासन पर पड़ा। अगर सभी सजाएं एक साथ चलतीं तो अपराध की गंभीरता पूरी तरह सामने नहीं आती।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को बाहर से बनाए गए किसी फर्जी अधिकार या प्रभाव के आधार पर प्रभावित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। खासकर तब, जब ऐसा प्रयास देश की सर्वोच्च अदालत के जज की पहचान का इस्तेमाल करके किया गया हो।

इस तरह 2017 में शुरू हुआ यह मामला अब सुकेश चंद्रशेखर को आठ साल की सजा के साथ एक अहम अदालती फैसले में बदल गया है। अदालत की टिप्पणियों में न्यायिक संस्थाओं की सुरक्षा के साथ-साथ AI और डीपफेक जैसी नई तकनीकों के गलत इस्तेमाल को लेकर भी चिंता साफ दिखाई देती है।

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