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TMC के 20 सांसदों के NCPI में जाने के दावे से सियासी हलचल, काकोली घोष बनीं नई अध्यक्ष

On: June 16, 2026 12:40 PM
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TMC : एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीस सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में दलबदल कर लिया है, और काकोली घोष पार्टी के नए अध्यक्ष चुने गए हैं। ममता बनर्जी के प्रभावशाली करीबी सहयोगी काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में उठाया गया यह रणनीतिक कदम दलबदल विरोधी कानून को दरकिनार करते हुए अपनी संसदीय सीटें सुरक्षित करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है। दलबदल करने वाले सांसद, जो टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक हैं, ने लोकसभा अध्यक्ष से औपचारिक रूप से मुलाकात कर नए दलबदल के लिए अपना बहुमत समर्थन घोषित किया और टीएमसी से एनसीपीआई में शामिल होने के अपने इरादे से अवगत कराया।

एनसीपीआई के नेतृत्व में हाल ही में बदलाव आया, जब इसकी पूर्व अध्यक्ष शेवाली कुंडू ने इस्तीफा दे दिया, जिससे बागी सांसदों के लिए सत्ता संभालने का रास्ता साफ हो गया। काकोली घोष का एनसीपीआई अध्यक्ष चुना जाना व्यापक रूप से पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी के प्रभाव और उपस्थिति को मजबूत करने के लिए उठाया गया एक रणनीतिक राजनीतिक कदम माना जा रहा है। यह घटनाक्रम राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति में विकसित हो रहे गठबंधनों और सत्ता समीकरणों को दर्शाता है। इस दलबदल से क्षेत्र में राजनीतिक निष्ठाओं की परिवर्तनशील प्रकृति उजागर होती है और दलबदल विरोधी कानूनों से जुड़ी जटिलताओं का पता चलता है, जो अक्सर ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच के दायरे में आ जाते हैं। इस कदम से टीएमसी और एनसीपीआई दोनों पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका है, जिससे भविष्य के चुनावों से पहले राजनीतिक परिदृश्य में संभावित रूप से बदलाव आ सकता है।

पर्दे के पीछे से BJP का पूरा साथ!

देखा जाए तो भाजपा ने अभी तक इस पूरे मामले में कोई कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इस पूरी रणनीति के पीछे भाजपा का ही हाथ है। ऐसा अनुमान इसलिए लगाया जा रहा है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे लगातार इन बागी सांसदों के संपर्क में थे। इसके अलावा गौर करने वाली बात यह भी है कि सभी बागी सांसदों की कई महत्वपूर्ण बैठकें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर ही हुईं। फिर बीते रविवार को इन 20 सांसदों ने स्पीकर को साफ कर दिया कि वे NCPI में शामिल होकर भाजपा के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा बनने जा रहे हैं और उन्होंने सत्ताधारी गठबंधन की तरफ सीटें आवंटित करने की मांग की है।

आखिर ममता बनर्जी के भतीजे से क्यों है नाराजगी?

इस बात को ऐसे समझिए कि टीएमसी के सबसे सीनियर सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय (6 बार के सांसद) भी पिछले दिनों इस बागी गुट में शामिल हो गए। इन सभी सांसदों के गुस्से की मुख्य वजह ममता बनर्जी के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी हैं। सांसदों का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी बेहद घमंडी हैं और वे पार्टी के सीनियर नेताओं को दरकिनार कर अपनी मनमानी चला रहे हैं।

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चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में क्या है NCPI?

गौरतलब है कि जिस NCPI पार्टी की किस्मत रातों-रात चमक गई है, उसका इतिहास ज्यादा बड़ा नहीं है या फिर यूं कहे कि बेहद मामूली है। NCPI का रजिस्ट्रेशन जनवरी 2023 में हुआ था और इसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल की एक बिल्डिंग का है।इसके बाद 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने 4 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को सिर्फ 536 वोट मिले थे। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में यह देश की उन 2000 से ज्यादा पार्टियों में शामिल है जिन्हें मान्यता नहीं मिली हुई है।

NCPI नए उदय की ओर

ऐसे में अगर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो यह गुमनाम पार्टी रातों-रात लोकसभा की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी और एनडीए में भाजपा के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल बन जाएगी। जिस पार्टी का आज तक कोई विधायक या सांसद नहीं था, वह सीधे देश की सत्ता का हिस्सा बनने जा रही है।सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पश्चिम बंगाल के बागी सांसदों के एक समूह की गुप्त राजनीतिक रणनीति का समर्थन कर रही है, हालांकि पार्टी ने इस बात की पुष्टि के लिए कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और सांसद निशिकांत दुबे समेत भाजपा के प्रमुख नेताओं का इन बागी सांसदों से लगातार संपर्क बना हुआ है। यादव के आवास पर कई महत्वपूर्ण बैठकें भी हुई हैं, जो इन चर्चाओं के रणनीतिक महत्व को दर्शाती हैं।

पिछले रविवार को, 20 सांसदों के इस समूह ने आगामी चुनावों में सीट आवंटन से संबंधित मांगों का हवाला देते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपीआई) और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होने की सार्वजनिक घोषणा की। ऐसा लगता है कि इस विद्रोह की वजह ममता बनर्जी के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के प्रति असंतोष है। वरिष्ठ सांसदों ने उन पर अहंकार और पार्टी के पुराने नेताओं को दरकिनार करने का आरोप लगाया है, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा है। जनवरी 2023 में पंजीकृत अपेक्षाकृत नई राजनीतिक पार्टी, एनसीपीआई, सीमित चुनावी रिकॉर्ड के बावजूद राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से उभरी है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इन बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो पार्टी संसद के निचले सदन में पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। ऐसा होने पर एनसीपीआई के लिए एक तीव्र और महत्वपूर्ण परिवर्तन होगा, जिससे यह रातोंरात एक हाशिए की पार्टी से एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन जाएगी। इस बदलाव का पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक परिदृश्य पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, जो भारतीय राजनीति में गठबंधनों और सत्ता संरचनाओं के संभावित पुनर्गठन का संकेत देता है।

Nikhil Kumar

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