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Mahalaya : महालया 2026 देवीपक्ष की शुरुआत, गंगा घाटों पर तर्पण और कुमारटुली में चक्षुदान

आज 10 अक्टूबर, शनिवार को महालया है। यह दिन पितृपक्ष के समापन और देवीपक्ष की शुरुआत का प्रतीक है। पश्चिम बंगाल समेत देशभर में बंगाली समुदाय के लिए यह दिन भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से बेहद खास है।

सुबह चार बजे का वक्त। अंधेरा अभी पूरी तरह छटा नहीं है। लेकिन बंगाल के घरों में रेडियो की नॉब घूम चुकी है। ट्रांजिस्टर, मोबाइल या टीवी — जो भी उपलब्ध है, उससे वही आवाज़ आ रही है जो 1931 से हर महालया की सुबह गूंजती आई है। बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज़ में 'महिषासुरमर्दिनी'। यह परंपरा करीब नौ दशक पुरानी है। जो लोग इसे सुनते हुए बड़े हुए हैं, उनके लिए यह केवल एक रेडियो कार्यक्रम नहीं है। यह महालया की पहचान है। बंगाल में कहा जाता है कि जब तक भद्र की आवाज़ न सुनाई दे, महालया अधूरी है। इस साल महालया 10 अक्टूबर, शनिवार को पड़ी है। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर रात 9:35 बजे से शुरू होकर 10 अक्टूबर रात 9:19 बजे तक रहेगी। तर्पण के लिए सबसे उपयुक्त समय सुबह 11:24 से दोपहर 1:56 बजे तक बताया गया है। महालया का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पहलू है पितृपक्ष का समापन। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन पूर्वजों को तर्पण और पिंडदान दिया जाता है। जल में काले तिल, कुशा और फूल मिलाकर पूर्वजों को अर्पित किया जाता है। कोलकाता में गंगा के घाटों पर सुबह से ही लोग जुटते हैं। जले कपड़े पहने पुरुष कमर तक पानी में खड़े होकर तर्पण करते हैं। यह दृश्य देखने में जितना साधारण लगता है, उतना ही भावनात्मक भी है। उन लोगों के लिए यह दिन खास है जिन्हें अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पूर्वजों को एक साथ श्रद्धांजलि दी जाती है।

कुमारटुली में चक्षुदान

महालया का दूसरा अहम पहलू है — मूर्तियों की आंखें बनाना। उत्तर कोलकाता के कुमारटुली इलाके में सैकड़ों मूर्तिकार महालया से पहले ही दुर्गा प्रतिमाओं के शरीर का काम पूरा कर लेते हैं। लेकिन आंखें महालया के दिन ही बनाई जाती हैं। इस रीति को 'चक्षुदान' कहा जाता है कुमारटुली में महालया के दिन भारी भीड़ रहती है। श्रद्धालु और पूजा समितियों के लोग मूर्तियां देखने आते हैं। मूर्तिकारों के लिए यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद मूर्तियों की बिक्री शुरू होती है। एक वरिष्ठ मूर्तिकार ने बताया कि चक्षुदान से पहले काफी मन एकाग्र करना पड़ता है। देवी की आंखें बनाते समय हाथ कांप सकता है, इसलिए पूरी सावधानी बरती जाती है।

'महिषासुरमर्दिनी' का इतिहास

महालया के दिन 'महिषासुरमर्दिनी' सुनने की परंपरा 1931 से चली आ रही है। यह कार्यक्रम आकाशवाणी से प्रसारित होता है। इसमें संस्कृत श्लोक, भक्ति गीत और चंडीपाठ शामिल होता है। बीरेंद्र कृष्ण भद्र इसके केंद्रीय स्वर हैं। इस कार्यक्रम को लेकर एक दिलचस्प घटना 1976 में हुई। उस साल आकाशवाणी ने भद्र की आवाज़ की जगह महानायक उत्तम कुमार को रखने की कोशिश की। 'दुर्गा दुर्गतिहारिणी' नाम से नया कार्यक्रम बनाया गया। लेकिन जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया। विरोध इतना बढ़ा कि आकाशवाणी को पुरानी रिकॉर्डिंग बहाल करनी पड़ी।

आगे की तारीखें

दुर्गा पूजा की मुख्य पूजा 16 अक्टूबर, शुक्रवार को महाषष्ठी से शुरू होगी। इसके बाद महासप्तमी 17 और 18 अक्टूबर को, महाष्टमी 19 अक्टूबर को और महानवमी 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। विजयादशमी 21 अक्टूबर, बुधवार को मनाई जाएगी, जिसके साथ प्रतिमाओं का विसर्जन होगा।

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Mission Aditya
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Founder – KhabarX Building an independent media platform where facts matter more than noise. Amplifying unheard stories, questioning silence, and creating journalism powered by truth, technology, and the next generation of changemakers.

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