दुनिया की अर्थव्यवस्था में जब भी कोई बड़ा बदलाव दिखाई देता है, BRICS पर चर्चा अपने आप तेज हो जाती है। पिछले दो दशकों में यह समूह चार देशों के संगठन से बढ़कर 11 देशों के बड़े मंच में बदल चुका है। अब इसकी अगली बड़ी बैठक भारत में होने जा रही है। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS का 18वां शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। बैठक में सदस्य देशों के नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा, निवेश और भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे। बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार माहौल के बीच इस बैठक को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कई देश अपने व्यापारिक रिश्तों और भुगतान प्रणालियों में नए विकल्प तलाश रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सम्मेलन में क्या घोषणाएं होती हैं। असली बात यह होगी कि सदस्य देश जिन मुद्दों पर चर्चा करते हैं, उन पर आगे कितना व्यावहारिक काम हो पाता है।
चार देशों से शुरू हुआ BRICS अब 11 देशों का समूह BRICS की शुरुआत करीब दो दशक पहले ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। उस समय इसे BRIC के नाम से जाना जाता था। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हो गया। इसके बाद समूह का विस्तार जारी रहा। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात इसके सदस्य बने। 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने के बाद BRICS का दायरा और बड़ा हो गया। 2026 भारत के लिए इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण वर्ष है क्योंकि BRICS की स्थापना के 20 साल पूरे हो रहे हैं। भारत इस साल समूह की अध्यक्षता कर रहा है और दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन इसकी अध्यक्षता का सबसे अहम पड़ाव होगा। भारत ने अपनी अध्यक्षता के लिए ‘Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability’ थीम तय की है। इसके केंद्र में आर्थिक मजबूती, तकनीकी विकास, आपसी सहयोग और टिकाऊ विकास जैसे मुद्दे हैं। भारत की अध्यक्षता के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में BRICS से जुड़े कई कार्यक्रम और बैठकें आयोजित की गई हैं। अब इन गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र नई दिल्ली बनने जा रहा है।
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार पर बढ़ सकती है चर्चा
BRICS की बैठकों में पिछले कुछ वर्षों से स्थानीय मुद्राओं में आपसी व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। दिल्ली सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर नजर रहेगी। अगर सदस्य देशों के बीच कारोबार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ता है तो कुछ लेनदेन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे उन देशों को फायदा हो सकता है जो आपसी व्यापार के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करना चाहते हैं। हालांकि इसे डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से हटाने की दिशा में तत्काल कदम मानना सही नहीं होगा। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था काफी जटिल है और अलग-अलग देशों की बैंकिंग प्रणाली, मुद्रा और आर्थिक नीतियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए दिल्ली में होने वाली चर्चा का महत्व इस बात से अधिक होगा कि क्या BRICS देश आपसी भुगतान को आसान बनाने के लिए कोई व्यावहारिक व्यवस्था विकसित कर पाते हैं। BRICS के सदस्य देशों के बीच व्यापार पहले से होता रहा है, लेकिन इसमें और विस्तार की संभावना है। भारत के लिए रूस से ऊर्जा और अन्य वस्तुओं का आयात, खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ व्यापार, चीन के साथ आर्थिक संबंध और ब्राजील जैसे बड़े बाजार महत्वपूर्ण हैं। अगर सदस्य देशों के बीच भुगतान प्रक्रिया आसान होती है और कारोबार की लागत घटती है, तो इसका असर व्यापार की गति पर पड़ सकता है। इसका फायदा केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। लंबे समय में छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए भी नए बाजारों तक पहुंच आसान हो सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ राजनीतिक सहमति काफी नहीं होगी। बैंकिंग नेटवर्क, मुद्रा विनिमय, भुगतान प्रणाली, व्यापार नियम और देशों के बीच भरोसे जैसे कई पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा। BRICS की अध्यक्षता भारत को अपनी आर्थिक और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से रखने का अवसर देती है। लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। BRICS में चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं, जबकि भारत के अमेरिका और यूरोप के साथ भी महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी होगा कि BRICS को किसी दूसरे देश या पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था के विरोध में खड़े मंच के रूप में पेश न किया जाए। भारत की कोशिश संभवतः ऐसे सहयोग पर केंद्रित रहेगी जिससे BRICS के भीतर आर्थिक संबंध मजबूत हों और साथ ही भारत के अन्य प्रमुख साझेदारों के साथ उसके रिश्तों पर भी कोई नकारात्मक असर न पड़े। BRICS का विस्तार जितना बड़ा अवसर है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी है। 11 सदस्य देशों की आर्थिक परिस्थितियां और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। किसी देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है तो कोई व्यापार और निवेश को प्राथमिकता देता है। कुछ देश भुगतान व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं, जबकि दूसरे विकास, बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहयोग को ज्यादा अहम मान सकते हैं। सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद भी हैं। भारत और चीन के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं। वहीं रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पहले से दिखाई देता है। ऐसे माहौल में हर मुद्दे पर सभी देशों की एक राय बनाना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि BRICS की वास्तविक ताकत केवल उसके सदस्यों की संख्या से तय नहीं होगी। महत्वपूर्ण यह होगा कि ये देश अपने मतभेदों के बावजूद किन मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग कर पाते हैं।
क्या BRICS वैश्विक व्यापार की तस्वीर बदल सकता है?
वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अचानक कोई बड़ा बदलाव हो जाएगा, ऐसी उम्मीद करना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन छोटे-छोटे बदलाव समय के साथ बड़ा असर जरूर पैदा कर सकते हैं। अगर BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, भुगतान व्यवस्था बेहतर होती है, निवेश के रास्ते खुलते हैं और ऊर्जा तथा सप्लाई चेन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ता है, तो इसका असर समूह से बाहर के देशों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल BRICS को अमेरिकी डॉलर या मौजूदा पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था का तत्काल विकल्प मानना सही नहीं होगा। लेकिन समूह का बढ़ता आकार विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आर्थिक चर्चाओं में ज्यादा प्रभावशाली आवाज जरूर देता है।
20 साल बाद BRICS के सामने असली चुनौती
BRICS ने पिछले 20 वर्षों में काफी विस्तार किया है। लेकिन अब इसकी सफलता केवल नए देशों को जोड़ने से तय नहीं होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक हित रखने वाले देशों को एक ऐसे मंच पर कैसे साथ रखा जाए, जहां फैसलों का असर वास्तविक अर्थव्यवस्था में भी दिखाई दे। दिल्ली में होने वाला 18वां शिखर सम्मेलन इसी वजह से महत्वपूर्ण है। अगर व्यापार, भुगतान, निवेश, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर ठोस प्रगति होती है तो आने वाले वर्षों में BRICS की भूमिका और मजबूत हो सकती है। दूसरी तरफ, अगर बैठक केवल घोषणाओं और औपचारिक बयानों तक सीमित रहती है तो वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बड़ा बदलाव आने में अभी समय लगेगा। 12 और 13 सितंबर की बैठक इसलिए केवल एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं होगी। BRICS के 20 साल पूरे होने के मौके पर भारत के सामने यह अवसर है कि वह समूह के बढ़ते आकार को व्यावहारिक आर्थिक सहयोग में बदलने की दिशा में आगे बढ़े। अब नजर इस बात पर रहेगी कि दिल्ली से निकलने वाला संदेश सिर्फ कागजों और घोषणाओं तक सीमित रहता है या आने वाले समय में देशों के बीच व्यापार और कारोबार करने के तरीके में भी उसका असर दिखाई देता है।
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