अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। Brent Crude का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। पश्चिम एशिया में तनाव अगर और बढ़ता है और इसका असर तेल की सप्लाई पर पड़ता है, तो कीमतों में और तेजी आ सकती है। ऐसे हालात में 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी एक संभावित जोखिम के तौर पर देखा जा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि समान मात्रा में क्रूड खरीदने के लिए भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे। लंबे समय तक कीमतें ऊंची रहने पर इसका असर आयात बिल, रुपये और महंगाई पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे पश्चिम एशिया की स्थिति एक अहम वजह है। तेल बाजार में भू-राजनीतिक तनाव का असर अक्सर कीमतों पर तेजी से दिखाई देता है, खासकर तब जब तेल की सप्लाई या उसकी आवाजाही प्रभावित होने का खतरा पैदा हो। बाजार केवल आज की सप्लाई को नहीं देखता। अगर कारोबारियों को लगता है कि आने वाले दिनों में तेल की उपलब्धता कम हो सकती है, तो वे संभावित जोखिम को पहले ही कीमतों में शामिल करना शुरू कर देते हैं। इसी वजह से पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने या किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरा बढ़ने की खबरों के साथ कच्चे तेल में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
120 डॉलर तक पहुंचने की स्थिति
120 डॉलर प्रति बैरल फिलहाल कोई तय कीमत या निश्चित भविष्यवाणी नहीं है। यह उस स्थिति का संभावित अनुमान है, जिसमें तनाव लंबे समय तक बना रहे और वैश्विक तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़े। अगर प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों या समुद्री रास्तों से सप्लाई बाधित होती है, तो बाजार में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा घट सकती है। मांग में बड़ी गिरावट नहीं आने पर इसका असर कीमतों पर पड़ना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ, अगर तनाव जल्द कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य बनी रहती है तो कीमतों में फिर गिरावट भी आ सकती है। इसलिए फिलहाल 120 डॉलर को संभावित जोखिम के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा, न कि तय मंजिल के तौर पर। भारत पर महंगे कच्चे तेल का सबसे सीधा असर उसके आयात खर्च पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के साथ देश को तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। कुछ दिनों की तेजी का असर सीमित रह सकता है, लेकिन अगर क्रूड लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो अतिरिक्त खर्च काफी बढ़ सकता है। इससे भारत के व्यापार घाटे और चालू खाते पर भी दबाव आने की आशंका रहती है। यानी भारत के लिए सिर्फ यह देखना जरूरी नहीं है कि तेल 100 या 120 डॉलर तक पहुंचता है या नहीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि कीमतें ऊंचे स्तर पर कितने समय तक बनी रहती हैं।
कमजोर रुपया परेशानी को और बढ़ा सकता है कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के साथ अगर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो स्थिति और मुश्किल हो सकती है। तेल का अंतरराष्ट्रीय कारोबार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। ऐसे में क्रूड की कीमत बढ़ने पर भारत के आयातकों को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। वहीं, अगर उसी समय रुपया कमजोर होता है तो उन डॉलर को खरीदने की लागत भी बढ़ जाती है। इसका मतलब भारत को एक साथ दो तरफ से दबाव झेलना पड़ सकता है—अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा तेल और घरेलू स्तर पर कमजोर रुपया।
असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर आमतौर पर सबसे पहले पेट्रोल और डीजल के दाम की चर्चा होती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रूड की कीमत में बदलाव का असर घरेलू ईंधन की कीमतों पर तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों पर टैक्स, सरकारी नीतियों और तेल कंपनियों के फैसलों का भी असर होता है। फिर भी अगर क्रूड लंबे समय तक महंगा रहता है तो परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। माल ढुलाई महंगी होने का असर धीरे-धीरे दूसरी वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। डीजल का इस्तेमाल सिर्फ वाहनों में ही नहीं होता। माल ढुलाई, कृषि मशीनरी, सिंचाई और कई दूसरे कामों में भी ईंधन की बड़ी भूमिका है। अगर ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ती है तो कंपनियों की उत्पादन और सप्लाई लागत भी बढ़ सकती है। कारोबारियों के पास बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने का विकल्प होता है। ऐसे में रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर दबाव देखने को मिल सकता है। हालांकि इसका असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होगा। घरेलू ईंधन कीमतें, रुपये की चाल, सरकारी नीतियां और वैश्विक तेल बाजार की स्थिति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि महंगे क्रूड का असर आम लोगों तक कितना पहुंचता है। अगर लंबे समय तक महंगे कच्चे तेल की वजह से महंगाई का दबाव बढ़ता है तो सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों के सामने संतुलन की चुनौती आ सकती है। सरकार के लिए एक तरफ उपभोक्ताओं पर बढ़ती ईंधन लागत का असर सीमित रखना जरूरी होगा, वहीं दूसरी ओर तेल क्षेत्र की वित्तीय स्थिति और सरकारी राजस्व का भी ध्यान रखना होगा। RBI के सामने महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती रहेगी। महंगा तेल उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ा सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
आम आदमी की जेब पर कैसे पड़ेगा असर?
महंगे क्रूड का असर सिर्फ शेयर बाजार या सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव होने पर लोगों के वाहन चलाने का खर्च प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा माल ढुलाई महंगी होने पर दुकानों तक पहुंचने वाले सामान की लागत बढ़ सकती है। अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत का हिस्सा ग्राहकों पर डालती हैं तो इसका असर रोजमर्रा की खरीदारी पर भी दिखाई दे सकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि क्रूड के 120 डॉलर पहुंचते ही हर वस्तु की कीमत बढ़ जाएगी। अलग-अलग क्षेत्रों पर इसका असर अलग गति और अलग स्तर पर दिखाई देता है। आने वाले दिनों में कच्चे तेल के बाजार की दिशा मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक सप्लाई और प्रमुख समुद्री रास्तों में कारोबार की स्थिति पर निर्भर करेगी। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो हाल की तेजी में कमी आ सकती है। लेकिन संकट लंबा खिंचता है और तेल की उपलब्धता प्रभावित होती है तो 100 डॉलर से ऊपर की कीमतें ज्यादा समय तक बनी रहने का जोखिम बढ़ जाएगा। भारत के लिए असली चिंता केवल 120 डॉलर का आंकड़ा नहीं है। परेशानी उस समय ज्यादा बढ़ेगी जब कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहे, रुपया कमजोर हो और देश का आयात खर्च लगातार बढ़ता जाए। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतों का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी गर्मी परिवहन, कारोबार, महंगाई और आखिरकार आम परिवार के बजट तक पहुंच सकती है।

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