काठमांडू: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा के बाद जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी और आर्थिक मुआवजे को लेकर अंतरराष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने शुरुआती बयानों में भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों से जलवायु आपदा के नुकसान के लिए न्याय और मुआवजे की बात कही थी। हालांकि, 4 सितंबर को नेपाल के विदेश मंत्री ने सफाई दी कि नेपाल सरकार ने भारत, चीन, अमेरिका या किसी अन्य देश से औपचारिक रूप से मुआवजा नहीं मांगा है। उन्होंने कहा कि उनका जोर हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और वैश्विक सहयोग पर है।
नेपाल में कितनी हुई तबाही?
नेपाल में आई आपदा से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है। ताजा सरकारी अनुमान के अनुसार संपत्ति, मकानों और बुनियादी ढांचे को करीब 387.5 अरब नेपाली रुपये यानी लगभग 2.56 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। करीब 7,500 मकान पूरी तरह नष्ट हुए हैं और लगभग 20,000 मकानों के पुनर्निर्माण की जरूरत बताई गई है। इससे पहले नेपाल के वित्त मंत्री ने पुनर्निर्माण और रिकवरी की लागत 4 से 5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया था।
भारत, चीन और अमेरिका का नाम क्यों आया?
नेपाल की ओर से उठाए गए जलवायु न्याय के मुद्दे में भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जक देशों का नाम आया हैं । जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी देशों पर गंभीर रूप से पड़ रहा है, जबकि नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को अकेले अरबों डॉलर का भुगतान करने का कोई फैसला हो गया है। अभी ऐसी कोई बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था या फैसला सामने नहीं आया है जिसके तहत भारत को नेपाल की बाढ़ का पूरा नुकसान भरना हो।
भारत ने नेपाल की मदद भी की
बाढ़ के बाद भारत ने नेपाल के साथ राहत और बचाव में सहयोग में उतरा था। भारत सरकार ने नेपाल की स्थिति पर नजर रखते हुए सीमावर्ती इलाकों में NDRF और अन्य बचाव टीमों को अलर्ट किया था।नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भी भारत और चीन की मदद के लिए धन्यवाद दिया है।
क्या नेपाल को अरबों डॉलर मिलेंगे?
फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि नेपाल को भारत या अन्य देशों से 2.56 अरब डॉलर या 4-5 अरब डॉलर का मुआवजा मिलना तय हो गया है।ये आंकड़े मुख्य रूप से आपदा से हुए नुकसान और संभावित पुनर्निर्माण लागत के अनुमान हैं। जलवायु मुआवजे की मांग अलग अंतरराष्ट्रीय और कानूनी प्रक्रिया का विषय है।नेपाल के विदेश मंत्री के ताजा स्पष्टीकरण के बाद इस पूरे मामले को भारत के खिलाफ औपचारिक मुआवजे की मांग के बजाय जलवायु न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बहस के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

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