दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने महंगाई की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई देशों में कीमतों का दबाव उम्मीद के मुताबिक कम नहीं हुआ है। ऐसे में ब्याज दरों में जल्द और बड़ी कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ रही है। इसके उलट, बाजार में यह चिंता बढ़ रही है कि दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं और कुछ परिस्थितियों में फिर बढ़ भी सकती हैं। इसका असर अब बॉन्ड बाजार में साफ दिखाई देने लगा है। ऑस्ट्रेलिया के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 15 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। अमेरिका में भी 10 साल के सरकारी बॉन्ड की दर वैश्विक वित्तीय संकट के शुरुआती दौर के बाद के सबसे ऊंचे स्तरों के करीब है।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब सरकारों और कंपनियों के लिए लंबे समय के कर्ज की लागत बढ़ना है। इसका असर आगे चलकर घर खरीदने वाले लोगों, कारोबार और निवेश बाजार तक पहुंच सकता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है। अमेरिका का सरकारी कर्ज हाल में 40 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। भारी सरकारी उधारी के बीच बड़ी टेक कंपनियां भी AI, डेटा सेंटर और उससे जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। यानी बाजार में कर्ज की मांग एक साथ कई दिशाओं से बढ़ रही है।
इसी बीच कुछ बड़े निवेशकों और केंद्रीय बैंकों के फैसलों ने अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर की भूमिका को लेकर बहस तेज कर दी है। ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक ने 2025 में अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी घटाई थी। नीदरलैंड के केंद्रीय बैंक ने भी हाल में अपने कुछ सोने के भंडार को अमेरिका और कनाडा से वापस लाने की जानकारी दी। बैंक ने इसका कारण बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच अपनी संकट-तैयारी को मजबूत करना बताया। नॉर्वे का विशाल सरकारी निवेश कोष भी अपने बॉन्ड निवेश में बदलाव पर विचार कर रहा है। हालांकि, इन फैसलों को सीधे तौर पर अमेरिकी बाजार से निवेशकों के पूरी तरह हटने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। बड़े संस्थागत निवेशक लगातार जोखिम और रिटर्न के हिसाब से अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करते रहते हैं।
दूसरी तरफ, तेल की कीमतों ने भी महंगाई की चिंता बढ़ा दी है। ईरान में सैन्य तनाव बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है। तेल महंगा होने से परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ता है। अर्थशास्त्रियों की नजर अब इस बात पर है कि सरकारें अपने बढ़ते बजट घाटे और कर्ज को किस तरह संभालती हैं। अमेरिकी सरकार ने लंबी अवधि के बॉन्ड की खरीद बढ़ाकर यील्ड को नीचे लाने की कोशिश की है, लेकिन बाजार में इसका असर स्थायी नहीं रहा। AMP के मुख्य अर्थशास्त्री शेन ओलिवर का मानना है कि अमेरिकी सरकार की ऐसी कोशिशें तब तक सीमित असर डालेंगी, जब तक बजट घाटे और आर्थिक बुनियादी स्थिति में सुधार नहीं होता। इस पूरे घटनाक्रम का असर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी पड़ सकता है। अगर वैश्विक स्तर पर लंबी अवधि की ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो घरेलू कर्ज की लागत पर भी दबाव बना रह सकता है। खास तौर पर variable-rate mortgage वाले परिवारों के लिए लंबे समय तक ऊंची दरें बड़ी चुनौती बन सकती हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वैश्विक आर्थिक संकट तय है। लेकिन बॉन्ड बाजार जिस तरह ऊंची यील्ड का संकेत दे रहा है, उसने निवेशकों और नीति-निर्माताओं की चिंता जरूर बढ़ा दी है।
सबसे अहम सवाल अब यही है कि अगर महंगाई पूरी तरह काबू में नहीं आती और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो क्या दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं इस दबाव को आसानी से झेल पाएंगी। शेयर बाजार, प्रॉपर्टी और कर्ज पर इसका असर आने वाले महीनों में इस सवाल का जवाब तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
फिलहाल तस्वीर किसी तत्काल वैश्विक आर्थिक संकट की नहीं, बल्कि बढ़ते वित्तीय दबाव और अनिश्चितता की है। आने वाले समय में महंगाई, तेल की कीमत, सरकारी कर्ज और केंद्रीय बैंकों की नीतियां बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे।

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