बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए डस्टबिन और मेडिकल वेस्ट से जुड़े सामान की खरीद को लेकर इन दिनों राजनीतिक विवाद तेज है। मामला तब चर्चा में आया जब खरीद से जुड़े दस्तावेजों और आरटीआई के हवाले से दावा किया गया कि 75 लीटर क्षमता वाले डस्टबिन की खरीद करीब ₹15,490 प्रति यूनिट की दर से की गई। वहीं 45 लीटर के कंटेनर की कीमत भी करीब ₹11 हजार बताई गई है। विपक्ष ने सवाल उठाया कि बाजार में इसी तरह के सामान्य डस्टबिन काफी कम कीमत पर उपलब्ध हैं तो सरकारी खरीद में इतनी ज्यादा कीमत क्यों दी गई। इस मामले ने तब और राजनीतिक रंग ले लिया जब RJD की ओर से आरोप लगाया गया कि डस्टबिन खरीद में ₹617 करोड़ का कथित घोटाला हुआ है। हालांकि यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है ₹617 करोड़ की रकम अभी जांच से साबित हुई घोटाले की राशि नहीं है। यह विपक्ष की ओर से लगाया गया आरोप है। अभी सरकार की जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। जन सुराज के नेता और बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर ने भी मामले को लेकर सवाल उठाए। उनका दावा है कि अगर ₹500 से ₹1,000 में मिलने वाला डस्टबिन करीब ₹15,000 में खरीदा गया है तो खरीद प्रक्रिया की गहराई से जांच होनी चाहिए। प्रशांत किशोर ने इस मामले को केवल एक मंत्री के कार्यकाल तक सीमित रखने पर भी सवाल उठाया।
प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव और मंगल पांडेय का नाम क्यों लिया?
प्रशांत किशोर के अनुसार डस्टबिन खरीद की प्रक्रिया तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान शुरू हुई और बाद में मंगल पांडेय के स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान आगे बढ़ी ,उन्होंने कहा कि इसलिए जांच केवल मंगल पांडेय तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि दोनों कार्यकाल और उस दौरान खरीद प्रक्रिया देखने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। खरीद किस संस्था ने की? रिपोर्टों के मुताबिक डस्टबिन की खरीद बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (BMSICL) के जरिए हुई थी। इसी वजह से अब जांच में खरीद की पूरी प्रक्रिया, टेंडर, कीमत तय करने का आधार, सप्लायर और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे। BMSICL की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है? किसी सरकारी खरीद में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि बाजार में सामान कितने रुपये में मिलता है। यह भी देखना पड़ता है कि सरकारी टेंडर में मांगी गई वस्तु की तकनीकी जरूरतें क्या थीं। अगर ये वास्तव में सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन थे, तो कीमत में इतना बड़ा अंतर गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है। लेकिन अगर ये विशेष मेडिकल वेस्ट कंटेनर थे, जिनमें अलग तकनीकी मानक और इस्तेमाल की शर्तें थीं तो सामान्य बाजार के डस्टबिन से सीधी तुलना करना सही नहीं होगा। इसलिए जांच रिपोर्ट आने से पहले यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पूरी खरीद भ्रष्टाचार थी। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने क्या किया? मामला राजनीतिक रूप से गरमाने के बाद बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने जांच के आदेश दिए। रिपोर्टों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग के विशेष सचिव एमएस त्यागराजन को जांच की जिम्मेदारी दी गई है। जांच में डस्टबिन के साथ-साथ दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में लगाए गए आरोपों को भी देखा जाना है। यानी अब सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज जांच समिति के सामने होंगे।
जांच में किन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे?
- एक यूनिट की कीमत ₹15,490 कैसे तय हुई?
- टेंडर में कितनी कंपनियों ने हिस्सा लिया?
- सबसे कम बोली कितनी थी?
- सामान किस कंपनी से खरीदा गया?
- कुल कितनी संख्या में डस्टबिन खरीदे गए?
- कुल कितना भुगतान किया गया?
- क्या खरीद प्रक्रिया सरकारी नियमों के अनुसार हुई?
- क्या सामान वास्तव में अस्पतालों में पहुंचा और इस्तेमाल हुआ?
- बाजार में इसी specification वाले उत्पाद की कीमत कितनी थी?
इन सवालों के जवाब आने के बाद ही वास्तविक वित्तीय अनियमितता का पता चल पाएगा। किसका हाथ है? फिलहाल किसी व्यक्ति की दोषी के रूप में पुष्टि नहीं हुई है। राजनीतिक आरोपों में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय और तेजस्वी यादव के कार्यकाल का उल्लेख किया गया है। वहीं खरीद प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग भी उठी है।
₹617 करोड़ के घोटाले का आरोप
इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग बातें आपस में मिल रही हैं।
- पहली: एक डस्टबिन/कंटेनर की बताई गई खरीद कीमत करीब ₹15,490 है।
- दूसरी: ₹617 करोड़ का आंकड़ा विपक्ष द्वारा लगाए गए व्यापक घोटाले के आरोप से जुड़ा है।
इन दोनों को जोड़कर यह कहना कि “₹617 करोड़ का घोटाला साबित हो गया” अभी सही नहीं है। जांच के बाद ही पता चलेगा कि वास्तविक खरीद कितने रुपये की थी और उसमें कोई वित्तीय अनियमितता हुई या नहीं।अब सबकी नजर स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट पर है। यदि जांच में खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ी, नियमों का उल्लंघन या सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के तथ्य सामने आते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों या संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जायेगी। वहीं अगर जांच में सामने आता है कि डस्टबिन सामान्य बाजार वाले उत्पाद नहीं बल्कि विशेष मेडिकल वेस्ट कंटेनर थे और उनकी कीमत तकनीकी मानकों के अनुसार उचित थी, तो ₹15,490 वाली कीमत की तस्वीर अलग हो सकती है।
इसलिए फिलहाल यह मामला “कथित डस्टबिन घोटाला” है, न कि जांच से साबित घोटाला।

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