पटना: बिहार में पंचायत चुनाव को लेकर गांवों में हलचल बढ़ने लगी है। अभी चुनाव की तारीख सामने नहीं आई है, लेकिन इसे लेकर मामला पटना हाईकोर्ट पहुंच चुका है। समय पर पंचायत चुनाव कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने दोनों पक्षों से हलफनामा दाखिल कर चुनाव की तैयारियों और मौजूदा स्थिति की जानकारी देने को कहा है। ऐसे में अब सरकार और आयोग के जवाब के बाद यह साफ होने की उम्मीद है कि चुनाव की तैयारी किस स्तर पर पहुंची है और आगे की प्रक्रिया किस तरह बढ़ेगी। याचिका में कहा गया है कि मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में संविधान और पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया है। मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि बिहार में मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का पांच साल का कार्यकाल 2026 में पूरा होने वाला है। ऐसे में चुनाव कराने की तैयारी को लेकर समय काफी महत्वपूर्ण हो गया है।
हाईकोर्ट ने सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है।
हालांकि, हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होने और जवाब मांगे जाने का मतलब यह नहीं है कि चुनाव की तारीख तय हो गई है। तारीख और चुनाव कार्यक्रम की घोषणा निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के तहत ही होगी। इस बार पंचायत चुनाव से पहले परिसीमन भी बड़ा मुद्दा है। पंचायत क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करने की प्रक्रिया चल रही है। इसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित की जाएंगी। परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा रहा है। सीमाएं बदलने के बाद कई पंचायतों और निर्वाचन क्षेत्रों का भूगोल बदल सकता है। इसका असर चुनावी समीकरण पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। कई जगह ऐसा हो सकता है कि जिस गांव या टोले के लोग अब तक एक पंचायत का हिस्सा थे, परिसीमन के बाद उनकी पंचायत बदल जाए। इसलिए गांवों में भी लोग परिसीमन की प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं। परिसीमन पूरा होने के बाद सीटों के आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। कौन-सी सीट किस श्रेणी के लिए आरक्षित होगी, इसकी जानकारी सामने आने के बाद ही संभावित उम्मीदवार अपनी तैयारी को लेकर स्पष्ट फैसला ले सकेंगे। इसके बाद मतदाता सूची को अंतिम रूप देने, मतदान केंद्र तय करने और चुनाव से जुड़ी दूसरी प्रशासनिक तैयारियां पूरी करनी होंगी। यानी चुनाव तक पहुंचने से पहले कई चरण पूरे करने हैं। इसी वजह से समय पर चुनाव कराने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में दाखिल याचिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2021 में हुआ था पिछला पंचायत चुनाव
बिहार में पिछला पंचायत चुनाव 2021 में हुआ था। उस समय मतदान कई चरणों में कराया गया था और चुनावी प्रक्रिया सितंबर से दिसंबर के बीच चली थी। अब पांच साल का कार्यकाल पूरा होने की ओर है। ऐसे में गांवों में एक बार फिर चुनावी चर्चा शुरू हो गई है। संभावित उम्मीदवार अपने-अपने स्तर पर तैयारी कर रहे हैं, जबकि ग्रामीणों की नजर इस बात पर है कि अगला चुनाव कब और किस व्यवस्था के तहत होगा। पंचायत चुनाव का असर सीधे गांव की व्यवस्था और विकास कार्यों पर पड़ता है। स्थानीय स्तर पर सड़क, नाली, पेयजल, साफ-सफाई और कई सरकारी योजनाओं से जुड़े काम पंचायतों के जरिए आगे बढ़ते हैं। यही कारण है कि पंचायत चुनाव को लेकर गांवों में राजनीतिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे बढ़ने लगती हैं। इस बार परिसीमन और आरक्षण के कारण कई जगह पुराने समीकरण बदलने की संभावना भी रहेगी। संभावित उम्मीदवारों के लिए भी अभी सबसे बड़ा इंतजार आरक्षण की तस्वीर साफ होने का है। सीट की स्थिति सामने आने के बाद ही कई लोग अपनी अगली रणनीति तय कर पाएंगे। फिलहाल अगली नजर राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के हलफनामे पर है। दोनों को अदालत को चुनाव की मौजूदा तैयारी और स्थिति की जानकारी देनी है। इसके बाद हाईकोर्ट मामले में आगे की सुनवाई करेगा। अदालत की टिप्पणी और आयोग की ओर से दी जाने वाली जानकारी से यह पता चलेगा कि चुनाव को लेकर प्रशासनिक तैयारी कितनी आगे बढ़ी है। इस बीच एक बात साफ है कि बिहार पंचायत चुनाव की चर्चा अब अदालत तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण इलाकों में भी लोगों की नजर आने वाले दिनों में होने वाली सुनवाई, परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया पर बनी रहेगी। चुनाव की तारीख को लेकर अभी आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

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